बजट 2026 के प्रस्तावों के तहत इक्विटी डेरिवेटिव्स पर प्रतिभूति लेनदेन कर (STT) में की गई वृद्धि ने भारत में वायदा और विकल्प (F&O) ट्रेडिंग की लागत संरचना को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया है। 15% किया गया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब सरकार डेरिवेटिव बाजार में बढ़ती सट्टेबाजी को नियंत्रित करना चाहती है और खुदरा निवेशकों के जोखिम को कम करने का प्रयास कर रही है।
सरकार ने इस कर वृद्धि को सही ठहराने के लिए भारत के डेरिवेटिव बाजार के विशाल आकार का उल्लेख किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में डेरिवेटिव ट्रेडिंग का कुल वॉल्यूम देश की जीडीपी से लगभग 500 गुना अधिक हो गया है। ₹300 लाख करोड़ की अनुमानित जीडीपी के मुकाबले डेरिवेटिव कारोबार का यह विस्तार नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। विश्लेषकों के अनुसार, सरकार का मानना है कि व्यापार अब सट्टेबाजी में तब्दील हो गया है, और इस गतिविधि को कम करने के लिए उच्च लेनदेन लागत आवश्यक है।
ऑप्शंस ट्रेडिंग पर कर का गणित और प्रभाव
ऑप्शंस ट्रेडिंग में एसटीटी पूरे कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू के बजाय केवल प्रीमियम वैल्यू पर लगाया जाता है और उदाहरण के तौर पर, यदि निफ्टी कॉल ऑप्शन ₹100 के प्रीमियम पर ट्रेड कर रहा है और लॉट साइज 65 है, तो कॉन्ट्रैक्ट का कुल प्रीमियम मूल्य ₹6,500 होता है। 50 का टैक्स लगता था। 75 प्रति लॉट हो गया है। हालांकि यह वृद्धि रुपयों में मामूली लग सकती है, लेकिन प्रतिशत के लिहाज से यह सीधे 50% की बढ़ोतरी है। उच्च आवृत्ति वाले ट्रेडर्स (HFT) और बार-बार ट्रेड करने वाले निवेशकों के लिए यह संचयी लागत काफी अधिक हो जाती है।
निफ्टी फ्यूचर्स के एक लॉट पर बढ़ा वित्तीय बोझ
फ्यूचर्स ट्रेडिंग में कर की गणना अधिक व्यापक होती है क्योंकि यह पूरे टर्नओवर मूल्य पर आधारित होती है। 13 लाख होता है। 02% के अनुसार, एक लॉट पर एसटीटी लगभग ₹325 था। 05% लागू होने के बाद, यह कर बढ़कर लगभग ₹817 प्रति लॉट हो गया है। इसका अर्थ है कि निफ्टी फ्यूचर्स में प्रत्येक ट्रेड पर अब व्यापारियों को लगभग ₹500 अतिरिक्त खर्च करने होंगे। यह वृद्धि सीधे तौर पर ट्रेडर के मुनाफे को कम करती है और नुकसान की स्थिति में बोझ बढ़ाती है।
ब्रेक-ईवन पॉइंट और ट्रेडिंग रणनीतियों में बदलाव
लेनदेन लागत में इस वृद्धि का सबसे बड़ा प्रभाव 'ब्रेक-ईवन पॉइंट' पर पड़ा है और विश्लेषकों के अनुसार, पहले व्यापारियों को केवल एसटीटी लागत की वसूली के लिए निफ्टी में लगभग 5 अंकों की बढ़त की आवश्यकता होती थी। अब, ₹817 के नए एसटीटी के साथ, केवल इस शुल्क को कवर करने के लिए सूचकांक को कम से कम 12 से 13 अंक ऊपर जाना होगा। इसमें ब्रोकरेज, एक्सचेंज शुल्क और जीएसटी शामिल नहीं हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि यह उन शॉर्ट-टर्म ट्रेडर्स के लिए चुनौतीपूर्ण है जो छोटे प्राइस मूवमेंट पर काम करते हैं और अब रणनीतियों को व्यवहार्य बनाए रखने के लिए कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव की आवश्यकता होगी।
बाजार विशेषज्ञों का विश्लेषण और तरलता की चिंता
बाजार के जानकारों ने चिंता व्यक्त की है कि ट्रांजेक्शन कॉस्ट में वृद्धि से बाजार की तरलता (Liquidity) प्रभावित हो सकती है। सैमको (SAMCO) ग्रुप के विश्लेषकों के अनुसार, डेरिवेटिव बाजार केवल सट्टेबाजी के लिए नहीं हैं, बल्कि ये हेजिंग और कैश मार्केट को लिक्विडिटी सपोर्ट प्रदान करने के महत्वपूर्ण तंत्र हैं और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के संदर्भ में भी चिंताएं जताई गई हैं, क्योंकि उच्च कर संरचना भारतीय बाजार को वैश्विक फंड्स के लिए कम आकर्षक बना सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रेडिंग वॉल्यूम में भारी गिरावट आती है, तो इसका असर बाजार की गहराई और मूल्य निर्धारण की दक्षता पर भी पड़ सकता है।
निष्कर्षतः, बजट 2026 के इन बदलावों ने एफएंडओ सेगमेंट में ट्रेडिंग की लागत को स्थायी रूप से बढ़ा दिया है। जहां सरकार इसे बाजार को स्थिर करने के एक उपाय के रूप में देख रही है, वहीं ट्रेडर्स को अब अपनी रणनीतियों और जोखिम प्रबंधन के तरीकों में बड़े बदलाव करने होंगे। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह कर वृद्धि वास्तव में सट्टेबाजी को कम करती है या केवल बाजार की सक्रियता को प्रभावित करती है।