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Budget 2026: 1 फरवरी को क्या आपकी जेब भरेगी? आसान भाषा में समझें पूरा गणित

Budget 2026: 1 फरवरी को क्या आपकी जेब भरेगी? आसान भाषा में समझें पूरा गणित
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आगामी 1 फरवरी, 2026 का दिन भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने वाला है। जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में अपना बही-खाता पेश करेंगी, तो देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय परिवारों की नजरें सिर्फ एक बात पर होंगी - क्या उन्हें टैक्स में राहत मिलेगी? इस बार का बजट इसलिए भी खास है क्योंकि वैश्विक स्तर पर आर्थिक समीकरण बदल रहे हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय शिपमेंट्स पर लगाए गए 50% टैरिफ ने भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ा। दी है, जिसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार और जीडीपी पर पड़ सकता है।

मुद्रास्फीति और जीडीपी: आपकी थाली और देश की तरक्की

वहीं 'जीडीपी' (सकल घरेलू उत्पाद) देश की आर्थिक सेहत का थर्मामीटर है। यह बताता है कि एक साल के भीतर देश ने कुल कितना उत्पादन किया और कितनी सेवाएं दीं। अगर जीडीपी बढ़ रही है, तो इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों में काम हो रहा है, नए स्टार्टअप खुल रहे हैं और लोगों को रोजगार मिल रहा है। बजट में जीडीपी ग्रोथ का अनुमान यह तय करता है कि विदेशी निवेशक भारत में कितना पैसा लगाएंगे।

अक्सर बजट भाषण में 'मुद्रास्फीति' यानी इन्फ्लेशन का जिक्र होता है। इसे आसान भाषा में 'महंगाई' कहते हैं। जब बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं और आपके पैसे की क्रय शक्ति कम हो जाती है, तो उसे मुद्रास्फीति कहा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि पिछले साल 100 रुपये में 2 किलो दाल आती थी और आज केवल 1. 5 किलो आ रही है, तो यह मुद्रास्फीति का असर है। सरकार का लक्ष्य इसे एक सीमित दायरे में रखना होता है ताकि आम आदमी की थाली महंगी न हो।

राजकोषीय घाटा और कैपेक्स: सरकार का उधार और निवेश

बजट में एक शब्द बार-बार आता है - 'फिस्कल डेफिसिट' या राजकोषीय घाटा। इसे ऐसे समझिए कि अगर आपकी कमाई 100 रुपये है और आप 120 रुपये खर्च कर रहे हैं, तो 20 रुपये का घाटा है। सरकार इस घाटे को पूरा करने के लिए बाजार से कर्ज लेती है। यदि यह घाटा बहुत ज्यादा बढ़ जाए, तो अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो जाता है। सरकार की कोशिश होती है कि वह इस घाटे को कम से कम रखे।

दूसरी तरफ 'कैपिटल एक्सपेंडिचर' (Capex) वह निवेश है जिसे सरकार 'भविष्य की कमाई' मानती है और जब सरकार नए हाईवे, रेलवे ट्रैक, एयरपोर्ट या अस्पताल बनाती है, तो उसे कैपेक्स कहा जाता है। इससे न केवल बुनियादी ढांचा मजबूत होता है, बल्कि सीमेंट, स्टील और लेबर सेक्टर में लाखों नौकरियां पैदा होती हैं। इस बार के बजट में उम्मीद है कि सरकार कैपेक्स। पर अपना फोकस बरकरार रखेगी ताकि आर्थिक रफ्तार बनी रहे।

टैक्स का गणित: डायरेक्ट बनाम इनडायरेक्ट

बजट का सबसे प्रतीक्षित हिस्सा इनकम टैक्स स्लैब होता है। 'डायरेक्ट टैक्स' वह है जो आप अपनी कमाई पर सीधे सरकार को देते हैं। इसमें होने वाला कोई भी बदलाव सीधे आपकी 'डिस्पोजेबल इनकम' यानी खर्च करने योग्य राशि को प्रभावित करता है। अगर टैक्स छूट बढ़ती है, तो आपकी जेब में ज्यादा पैसा। बचता है, जिसे आप निवेश या खरीदारी में लगा सकते हैं।

वहीं 'इनडायरेक्ट टैक्स' जैसे जीएसटी (GST) हर उस व्यक्ति को देना पड़ता है जो कोई सामान या सेवा खरीदता है। चाहे वह अमीर हो या गरीब, बिस्किट के पैकेट पर लगने वाला टैक्स सबके लिए बराबर होता है। इसके अलावा 'कस्टम ड्यूटी' वह टैक्स है जो विदेशों से आने वाले सामान पर लगता है। अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड वॉर के बीच, भारत कुछ विदेशी सामानों पर। कस्टम ड्यूटी बढ़ाकर अपने घरेलू उद्योगों (Make in India) को सुरक्षा दे सकता है।

अमेरिकी टैरिफ और विनिवेश की चुनौती

अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाने की घोषणा ने इस बजट की गंभीरता बढ़ा दी है। वित्त मंत्री को ऐसे प्रावधान करने होंगे जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिले और हम निर्यात के लिए केवल एक देश पर निर्भर न रहें और इसके साथ ही 'विनिवेश' (Disinvestment) के जरिए सरकार अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर फंड जुटाने की कोशिश करेगी। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे कोई परिवार अपनी पुरानी संपत्ति बेचकर नया बिजनेस शुरू करने के लिए पैसा जुटाता है।

कुल मिलाकर, 1 फरवरी का बजट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह आपके घर के बजट, बच्चों की शिक्षा और भविष्य की बचत का रोडमैप है। क्या सरकार लोकलुभावन घोषणाएं करेगी या कड़े आर्थिक फैसले लेगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

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