Chabahar Port: चाबहार पोर्ट विवाद: कांग्रेस का आरोप, विदेश मंत्रालय का खंडन और अमेरिका के प्रतिबंधों की जटिलता

Chabahar Port - चाबहार पोर्ट विवाद: कांग्रेस का आरोप, विदेश मंत्रालय का खंडन और अमेरिका के प्रतिबंधों की जटिलता
| Updated on: 16-Jan-2026 09:23 PM IST
कांग्रेस ने शुक्रवार को एक गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में आकर ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट से भारत का नियंत्रण छोड़ दिया है। पार्टी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर यह दावा किया, जिसमें कहा गया कि मोदी सरकार ने चाबहार परियोजना में देश की जनता के 120 मिलियन डॉलर (जो लगभग 1100 करोड़ रुपए के बराबर हैं) का निवेश किया था, और अब यह निवेश बर्बाद हो चुका है। यह आरोप भारत की विदेश नीति और आर्थिक हितों पर सवाल उठाता है, खासकर ऐसे। समय में जब क्षेत्रीय भू-राजनीति में चाबहार पोर्ट की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

विदेश मंत्रालय का आरोपों का खंडन

कांग्रेस के इन आरोपों को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने तुरंत खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान के चाबहार पोर्ट से जुड़ी योजनाएं अभी भी जारी हैं और भारत इन्हें आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका के साथ लगातार बातचीत कर रहा है। जायसवाल ने जोर देकर कहा कि चाबहार पोर्ट भारत के लिए एक महत्वपूर्ण परियोजना है और सरकार इसके विकास और संचालन के लिए प्रतिबद्ध है। उनका यह बयान कांग्रेस के दावों को सीधे तौर पर चुनौती देता है और परियोजना की वर्तमान स्थिति के बारे में सरकार का आधिकारिक रुख प्रस्तुत करता है। यह स्पष्टीकरण भारत की कूटनीतिक सक्रियता और परियोजना के प्रति उसकी दृढ़ता को दर्शाता है।

अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों में छूट का विस्तार

अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों के बावजूद भारत को चाबहार पोर्ट से जुड़े काम जारी रखने के लिए एक विशेष सैंक्शन छूट प्रदान की है। यह छूट भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसे ईरान के साथ व्यापार और विकास परियोजनाओं में शामिल होने की अनुमति देती है, जबकि अन्य देशों को ऐसे प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। इस छूट की अवधि, जो पहले 27 अक्टूबर 2025 को समाप्त होने वाली थी, को अमेरिका ने एक बार फिर 6 महीने के लिए बढ़ा दिया है। अब यह छूट 26 अप्रैल 2026 तक मिलती रहेगी और यह विस्तार भारत के लिए एक बड़ी राहत है और चाबहार परियोजना के निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करता है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारत को एक पत्र भेजकर इस छूट से जुड़े दिशा-निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा कि भारत अब इसी तय व्यवस्था के तहत अमेरिका से बातचीत कर रहा है, ताकि चाबहार पोर्ट से जुड़े काम बिना रुकावट आगे बढ़ते रहें और यह दर्शाता है कि भारत और अमेरिका के बीच इस संवेदनशील मुद्दे पर एक कार्यशील समझ बनी हुई है।

अमेरिका की ईरान पर आर्थिक दबाव की नीति

अमेरिका ने ईरान के चाबहार पोर्ट पर प्रतिबंध इसलिए लगाए हैं क्योंकि वह ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाना चाहता है। अमेरिका का मानना है कि ईरान बंदरगाहों, तेल व्यापार और अन्य अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल विकास और पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए करता है। इसी वजह से अमेरिका ईरान की आय के सभी बड़े स्रोतों को सीमित करना चाहता है, ताकि उस पर अपनी नीतियों में बदलाव लाने का दबाव बनाया जा सके। इसके अलावा, अमेरिका 2018 में ईरान के परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलने के बाद से 'मैक्सिमम प्रेशर' पॉलिसी अपना रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान को अपनी क्षेत्रीय और परमाणु महत्वाकांक्षाओं से पीछे हटने के लिए मजबूर करना है। यह नीति ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने और उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अलग-थलग करने पर केंद्रित है।

चाबहार पोर्ट से भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक लाभ

चाबहार पोर्ट भारत के लिए कई रणनीतिक और आर्थिक फायदे लेकर आता है, जो इसे एक अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना बनाता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह भारत को बिना। पाकिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया तक सीधी पहुंच प्रदान करता है। पहले भारत को अफगानिस्तान या दूसरे एशियाई देशों तक सामान भेजने के लिए पाकिस्तान के रास्ते से जाना पड़ता था, जो अक्सर सीमा विवादों और राजनीतिक तनाव के कारण मुश्किल होता था और चाबहार पोर्ट के माध्यम से भारत सीधे अपना माल अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया भेज सकता है, जिससे समय और पैसा दोनों की बचत होती है। यह भारत की 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।

व्यापार में वृद्धि और लॉजिस्टिक खर्च में कमी

चाबहार पोर्ट के माध्यम से भारत अपने सामान, जैसे दवाएं, खाद्य पदार्थ और औद्योगिक उत्पाद, आसानी से दूसरे देशों तक भेज सकता है और इससे भारत का निर्यात बढ़ेगा और लॉजिस्टिक खर्च (ढुलाई खर्च) कम होगा, जिससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। यह पोर्ट भारत को ईरान से तेल खरीदने में भी। आसानी प्रदान करता है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है। दोनों देश मिलकर चाबहार को एक महत्वपूर्ण ट्रेड हब बना सकेंगे, जो क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देगा और आर्थिक एकीकरण को मजबूत करेगा। यह पोर्ट भारत के लिए एक आर्थिक गलियारे के रूप में कार्य करेगा, जो नए बाजारों तक पहुंच प्रदान करेगा।

भारत ने चाबहार पोर्ट के विकास में काफी पैसा और संसाधन लगाए हैं, जिससे इस परियोजना में उसका महत्वपूर्ण आर्थिक हित जुड़ा हुआ है और इस निवेश की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत के लिए प्राथमिकता है। इसके अलावा, चाबहार बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के नजदीक है, जहां चीन भारी निवेश कर रहा है। इसलिए, यह पोर्ट भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाता है और क्षेत्र में चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को प्रभावी ढंग से काउंटर करने में मदद करता है। यह भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति और प्रभाव को बढ़ाने का अवसर भी प्रदान करता है, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।

अफगानिस्तान को मानवीय सहायता और व्यापार मार्ग

चाबहार पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान को आवश्यक सामान भेजने का एक महत्वपूर्ण मार्ग भी है। पहले भारत को अफगानिस्तान को माल भेजने के लिए पाकिस्तान से गुजरना पड़ता था, लेकिन सीमा विवाद और राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह अक्सर मुश्किल होता था। चाबहार ने यह रास्ता आसान बनाया है, जिससे भारत इस बंदरगाह से अफगानिस्तान को गेहूं जैसी आवश्यक वस्तुएं भेज सकता है और मध्य एशिया से गैस-तेल जैसे महत्वपूर्ण संसाधन ला सकता है। यह पोर्ट अफगानिस्तान की आर्थिक स्थिरता और मानवीय सहायता के लिए एक जीवन रेखा के। रूप में कार्य करता है, जो क्षेत्र में भारत की सॉफ्ट पावर को भी बढ़ाता है।

चाबहार परियोजना का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारत की चाबहार बंदरगाह परियोजना में रुचि 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय शुरू हुई थी, जब ईरान के साथ इस पर बातचीत शुरू हुई थी। हालांकि, अमेरिका-ईरान तनाव के कारण यह परियोजना कुछ समय के लिए रुक गई थी। 2013 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने इस परियोजना में 800 करोड़ रुपए के निवेश की बात कही थी, जो भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। 2016 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान और अफगानिस्तान के नेताओं के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया, जिसमें भारत ने एक टर्मिनल के लिए 700 करोड़ रुपए और बंदरगाह के विकास के लिए 1250 करोड़ रुपए का कर्ज देने की घोषणा की। यह समझौता परियोजना को एक नई गति प्रदान करने वाला था। हाल ही में, 2024 में तत्कालीन विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने ईरान के विदेश मंत्री से। कनेक्टिविटी पर चर्चा की, जो परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर राजनयिक प्रयासों को दर्शाता है। भारतीय कंपनी IPGL के अनुसार, बंदरगाह पूरा होने पर इसकी क्षमता 82। मिलियन टन होगी, जो इसे एक प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार केंद्र बना देगा।

ईरान से व्यापार पर अमेरिकी टैरिफ और भारत का रुख

अमेरिका ने 12 जनवरी को ईरान के साथ व्यापार करने पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इसे लेकर पूछे गए सवाल पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जायसवाल ने कहा कि भारत इन घटनाक्रमों पर करीबी नजर रखे हुए है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले वित्त वर्ष में भारत और ईरान के बीच कुल व्यापार लगभग 1 और 6 अरब डॉलर (करीब ₹145. 1 अरब) रहा। इसमें भारत का ईरान को निर्यात लगभग 1. 2 अरब डॉलर (करीब ₹108. 8 अरब) था, जबकि ईरान से आयात लगभग 0 और 4 अरब डॉलर (₹36. 3 अरब) रहा। जायसवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत के कुल वैश्विक व्यापार में ईरान की हिस्सेदारी बहुत कम है, जो लगभग 0 और 15% है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि अमेरिकी टैरिफ का भारत-ईरान व्यापार पर सीधा प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन भारत फिर भी स्थिति की निगरानी कर रहा है।

ईरान में हिरासत में लिए गए भारतीय नागरिक और राजनयिक प्रयास

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जायसवाल ने यह भी बताया कि ईरान में हिरासत में लिए गए 10 भारतीय नागरिकों के लिए भारत ने कांसुलर एक्सेस की मांग की है। इन 10 लोगों को इसलिए हिरासत में लिया गया था क्योंकि ईरान का कहना है कि जिस जहाज पर वे काम कर रहे थे, उस पर ईंधन की तस्करी हो रही थी। भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए सभी आवश्यक राजनयिक कदम उठा रहा है और इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह भी जानकारी दी कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान में जारी हिंसा को लेकर वहां के विदेश मंत्री अब्बास अघारची से बात की है। यह बातचीत क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती। है, साथ ही अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए सक्रिय कूटनीति का भी प्रमाण है।

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।