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चाबहार पोर्ट: ₹15,000 करोड़ का व्यापार और भारत की रणनीतिक कूटनीति

चाबहार पोर्ट: ₹15,000 करोड़ का व्यापार और भारत की रणनीतिक कूटनीति
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ईरान और इजराइल के बीच हालिया संघर्ष विराम के बाद वैश्विक व्यापारिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस बीच, ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत की रणनीतिक और व्यापारिक महत्वाकांक्षाओं के लिए केंद्र बिंदु बनकर उभरा है। भारत और ईरान के बीच वर्तमान में लगभग ₹15,000 करोड़ का द्विपक्षीय व्यापार होता है, जिसमें चाबहार पोर्ट की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिकारियों के अनुसार, भारत इस पोर्ट के माध्यम से मध्य पूर्व और यूरोप तक अपनी पहुंच मजबूत करना चाहता है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों से मिली छूट की समयसीमा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

चाबहार पोर्ट की भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति

चाबहार पोर्ट ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित है। रणनीतिक दृष्टि से यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से मात्र 170 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत के लिए इसकी भौगोलिक स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान को बायपास करते हुए सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता है। कांडला पोर्ट से इसकी दूरी 550 नॉटिकल माइल और मुंबई से 786 नॉटिकल माइल है, जो इसे समुद्री व्यापार के लिए एक किफायती विकल्प बनाती है।

भारत-ईरान के बीच 10 साल का ऐतिहासिक समझौता

मई 2024 में भारत ने चाबहार पोर्ट के संचालन के लिए ईरान के साथ एक दीर्घकालिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) के माध्यम से किया गया है। इस डील के तहत भारत पोर्ट के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 120 मिलियन डॉलर का निवेश करेगा। इसके अतिरिक्त, भारत ने बंदरगाह से जुड़ी सुविधाओं के विस्तार के लिए 250 मिलियन डॉलर की ऋण सुविधा देने की भी प्रतिबद्धता जताई है। यह समझौता 10 वर्षों के लिए प्रभावी है और इसमें स्वतः नवीनीकरण का प्रावधान भी शामिल है।

अमेरिकी प्रतिबंध और छूट की समयसीमा का संकट

साल 2018 में अमेरिका द्वारा ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद, भारत को चाबहार पोर्ट के विकास और संचालन के लिए विशेष छूट (सेंक्शन वेवियर) दी गई थी। हालांकि, इस छूट की समयसीमा को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, वर्तमान छूट की समयसीमा 26 अप्रैल 2026 को समाप्त होने वाली है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, भारत सरकार इस समयसीमा को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिकी प्रशासन के साथ निरंतर संपर्क में है ताकि पोर्ट के संचालन में कोई बाधा न आए।

व्यापारिक महत्व और ₹15,000 करोड़ का टर्नओवर

भारत और ईरान के बीच होने वाले ₹15,000 करोड़ के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। चाबहार पोर्ट न केवल द्विपक्षीय व्यापार को सुगम बनाता है, बल्कि यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस कॉरिडोर के माध्यम से भारत से रूस और यूरोप तक माल भेजने की लागत में 30% और समय में 40% तक की कमी आने का अनुमान है। हाल ही में ईरानी दूतावास ने इस पोर्ट को भारत और ईरान के बीच व्यापार का 'गोल्डन ब्रिज' करार दिया है।

चीन और पाकिस्तान के लिए रणनीतिक चुनौती

चाबहार पोर्ट को अक्सर चीन की 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (BRI) और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जवाब के रूप में देखा जाता है। इस पोर्ट के माध्यम से भारत अपनी क्षेत्रीय उपस्थिति को मजबूत कर रहा है। यदि भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों से दीर्घकालिक छूट मिलती है, तो वह मध्य एशिया के बाजारों में चीन के प्रभुत्व को कड़ी टक्कर दे सकेगा। संसदीय विदेश मामलों की समिति ने भी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारत सरकार सभी संबंधित पक्षों के साथ बातचीत कर रही है ताकि इस रणनीतिक संपत्ति का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

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