होर्मुज संकट के बीच चीन ने शुरू किया 5500 किमी लंबा आइस सिल्क रोड

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होर्मुज संकट के बीच चीन ने शुरू किया 5500 किमी लंबा आइस सिल्क रोड
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होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर में चल रहे गंभीर संकट के बीच चीन ने यूरोप तक अपने सामान की सुरक्षित और तेज पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक नया समुद्री रास्ता सक्रिय कर दिया है। इसे आइस सिल्क रोड के नाम से जाना जा रहा है। यह समुद्री मार्ग रूस के उत्तरी तट से होते हुए आर्कटिक महासागर के रास्ते यूरोप तक पहुंचता है और इस पूरे रास्ते की लंबाई लगभग 3400 मील यानी करीब 5500 किमी है। यह नया मार्ग उन पारंपरिक रास्तों का एक मजबूत विकल्प बनकर उभरा है जो वर्तमान में भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षा खतरों से घिरे हुए हैं।

साप्ताहिक सेवा और समय की बचत

इस मार्ग के व्यावसायिक उपयोग में एक बड़ी प्रगति 15 अगस्त को देखी गई, जब चीनी कंटेनर शिपिंग कंपनी सी लीजेंड ने इस रास्ते से अपनी पहली नियमित साप्ताहिक सेवा की शुरुआत की। इस सेवा के तहत जहाज चीन के निंगबो-झोउशान बंदरगाह से रवाना होकर ब्रिटेन के फेलिक्सस्टो पोर्ट तक जाते हैं और फेलिक्सस्टो बंदरगाह लंदन से लगभग 70 मील उत्तर में स्थित है। इस नए रास्ते की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गति है। आइस सिल्क रोड के माध्यम से यह यात्रा मात्र 20 दिन में पूरी की जा सकती है, जबकि स्वेज नहर के पारंपरिक रास्ते से इसी यात्रा में लगभग 40 दिन का समय लगता है। इस प्रकार, यह रास्ता यात्रा के समय को लगभग आधा कर देता है।

होर्मुज और लाल सागर संकट का प्रभाव

चीन के लिए इस उत्तरी रास्ते की आवश्यकता तब और बढ़ गई जब फरवरी में ईरान युद्ध की स्थितियों के कारण होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पर बुरा असर पड़ा। इसके साथ ही, लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट में हूती विद्रोहियों के हमलों के खतरे ने व्यापारिक जहाजों के लिए भारी जोखिम पैदा कर दिया है। इन खतरों के कारण कई जहाजों को लंबे और वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे यात्रा का समय, ईंधन की खपत और बीमा का खर्च काफी बढ़ गया है। इन परिस्थितियों ने वैश्विक सप्लाई चेन पर भारी दबाव डाला है, जिससे चीन को इस नए मार्ग पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

इतिहास और पिघलती बर्फ का योगदान

आर्कटिक के इस उत्तरी समुद्री रास्ते पर चीन की नजर काफी पुरानी है और साल 2013 में योंग शेंग नामक एक चीनी मालवाहक जहाज इस रास्ते का उपयोग कर यूरोप पहुंचने वाला पहला चीनी जहाज बना था। हालांकि, उस समय समुद्र में जमी बर्फ की मोटी परतों के कारण यहां नियमित रूप से जहाजों का संचालन करना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन और आर्कटिक में बढ़ते तापमान के कारण समुद्री बर्फ तेजी से पिघल रही है और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन के शोध के अनुसार, आर्कटिक की बर्फ पिघलने की रफ्तार में हाल के दिनों में काफी तेजी आई है। इसी का परिणाम है कि नॉर्दर्न सी रूट (NSR) अब साल के अधिक समय तक जहाजों की आवाजाही के लिए खुला रहता है।

रूस की भूमिका और रणनीतिक महत्व

आइस सिल्क रोड का यह मार्ग मुख्य रूप से रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्र में आता है। रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों को परमिट जारी करती है, उनकी निगरानी करती है और जरूरत पड़ने पर बर्फ काटने वाले जहाज यानी आइसब्रेकर उपलब्ध कराती है। इस मार्ग के लिए चीन को रूस पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन इसके बदले में चीन को मलक्का स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता कम करने का मौका मिल रहा है और वर्तमान में चीन के कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा मलक्का स्ट्रेट से होकर आता है। चीन को हमेशा यह डर सताता है कि किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय संघर्ष की स्थिति में मलक्का स्ट्रेट की नाकाबंदी उसकी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।

वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियां

हालांकि आइस सिल्क रोड एक क्रांतिकारी विकल्प है, लेकिन फिलहाल यह स्वेज नहर या अन्य पारंपरिक रास्तों का पूर्ण विकल्प नहीं बन पाया है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में केवल 15 कंटेनर जहाज इस रास्ते से गुजरे और साल 2025 में यह संख्या 23 रहने का अनुमान है। सी लीजेंड कंपनी ने अक्टूबर में इस रास्ते का सफल परीक्षण किया था और अब उसकी योजना आवागमन के सीजन को वर्तमान 2 महीने से बढ़ाकर 3 और फिर 4 महीने करने की है। कंपनी का अंतिम लक्ष्य इस रास्ते को सालभर इस्तेमाल के योग्य बनाना है और फिर भी, बर्फ की अनिश्चितता, खराब मौसम, संचालन की उच्च लागत और रूस पर निर्भरता जैसी चुनौतियां इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं।

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