ईरान से जुड़े संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ती अस्थिरता ने वैश्विक तेल बाजारों में भारी उथल-पुथल मचा दी है और दुनिया के कई देशों को आशंका है कि अगर इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में रुकावट आती है तो ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस तरह के संकट से निपटने के लिए लंबे समय से तैयारी कर रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक बीजिंग ने पिछले करीब 20 वर्षों में एक व्यापक और बहुस्तरीय रणनीति तैयार की है, ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति मार्गों में व्यवधान आने पर भी उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर न पड़े। इस रणनीति में बड़े रणनीतिक तेल भंडार बनाना, ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों का विविधीकरण, दीर्घकालिक ऊर्जा समझौते और वैश्विक बुनियादी ढांचे में निवेश जैसे कई अहम कदम शामिल हैं।
होर्मुज में संकट की आशंका और चीन का आयात
चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आयात करता है। ऊर्जा विश्लेषण फर्म Kpler के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, चीन ईरान से भेजे जाने वाले तेल का 80% से अधिक खरीदता है। 4% था। दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लगभग 2करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जो वैश्विक तेल खपत का करीब 20% है। यही कारण है कि इस संकरे समुद्री मार्ग में किसी भी तरह का व्यवधान वैश्विक ऊर्जा बाजार को तुरंत प्रभावित कर सकता है और मौजूदा तनाव के चलते टैंकरों की आवाजाही घटने लगी है और तेल की कीमतें 100डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं।
विशाल रणनीतिक तेल भंडार का निर्माण
चीन की तैयारी का सबसे अहम हिस्सा उसके बड़े रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) हैं। पिछले दो दशकों में चीन ने देशभर में विशाल तेल भंडारण सुविधाएं विकसित की हैं, जिनमें करोड़ों बैरल कच्चा तेल संग्रहित किया जा सकता है और अनुमान है कि ये भंडार चीन को 100दिनों से अधिक की तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। इससे आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में देश को वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। चीन ने झौशान, झेनहाई और डालियान जैसे तटीय क्षेत्रों में विशाल भूमिगत और सतह पर भंडारण टैंक बनाए हैं, जो किसी भी वैश्विक झटके के दौरान बफर के रूप में कार्य करते हैं।
रूस और मध्य एशिया के साथ ऊर्जा विविधीकरण
चीन ने अपनी ऊर्जा आपूर्ति को केवल मध्य-पूर्व पर निर्भर नहीं रहने दिया है। इस दिशा में रूस बीजिंग का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बनकर उभरा है। पाइपलाइन नेटवर्क और दीर्घकालिक समझौतों के जरिए चीन को रूस से सीधे तेल और गैस की आपूर्ति मिलती है, जिससे समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम होती है। पूर्वी साइबेरिया-प्रशांत महासागर (ESPO) पाइपलाइन के माध्यम से चीन को सीधे रूसी तेल प्राप्त होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान से तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो चीन और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। इसके अलावा चीन ने अफ्रीका, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका से भी तेल आयात बढ़ाकर जोखिम को कई क्षेत्रों में विभाजित किया है।
ईरान के साथ 25 वर्षीय रणनीतिक साझेदारी
ऊर्जा स्रोतों का विस्तार करने के बावजूद चीन ने ईरान के साथ अपने ऊर्जा संबंध बनाए रखे हैं। दोनों देशों के बीच 25साल का रणनीतिक सहयोग समझौता हुआ है, जिसके तहत चीन ईरान के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश करता है और बदले में उसे स्थिर तेल आपूर्ति मिलती है। इस समझौते के कारण चीन को भू-राजनीतिक तनाव के दौर में भी अपेक्षाकृत सस्ता ईरानी तेल मिलता रहता है। चीन की छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियां, जिन्हें 'टीपोट्स' कहा जाता है, ईरानी तेल की मुख्य खरीदार हैं और ये रिफाइनरियां अक्सर युआन में भुगतान करती हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर आधारित वित्तीय प्रतिबंधों का प्रभाव कम हो जाता है।
बेल्ट एंड रोड और वैकल्पिक बुनियादी ढांचा
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए चीन ने वैश्विक स्तर पर बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है। बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के तहत एशिया, मध्य-पूर्व और अफ्रीका में बंदरगाह, पाइपलाइन और परिवहन गलियारे विकसित किए गए हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य व्यापार बढ़ाने के साथ-साथ ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक मार्ग तैयार करना भी है और मध्य एशिया और रूस से आने वाली पाइपलाइनों ने समुद्री मार्गों पर चीन की निर्भरता काफी हद तक कम कर दी है। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह और म्यांमार के माध्यम से तेल पाइपलाइन जैसी परियोजनाएं चीन को मलक्का जलडमरूमध्य जैसे पारंपरिक समुद्री चोकपॉइंट्स से बचने का विकल्प प्रदान करती हैं।