नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने वैश्विक राजनीति में एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की नींव रख दी है। शनिवार को सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से नई दिल्ली घोषणा पत्र को मंजूरी दी, जो भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा करते हुए कहा कि किसी भी सदस्य देश ने इस घोषणा पत्र पर कोई आपत्ति नहीं जताई। यह सहमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शनिवार सुबह तक विभिन्न मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच गहन बातचीत और विचार-विमर्श का दौर चलता रहा। अलग-अलग वैश्विक मुद्दों पर देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद, भारत ने अपनी मध्यस्थता और निरंतर संवाद के जरिए सभी पक्षों को एक मंच पर लाने में अहम भूमिका निभाई।
भारत की कूटनीतिक जीत और आतंकवाद पर कड़ा प्रहार
इस घोषणा पत्र में भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि आतंकवाद के खिलाफ ब्रिक्स देशों का एकजुट होना है। घोषणा पत्र में विशेष रूप से पहलगाम में हुए आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई है और सदस्य देशों ने आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने पर सहमति जताई है। भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद और आतंकियों को मिलने वाली फंडिंग का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है, और इस बार ब्रिक्स घोषणा पत्र में इन विषयों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र की व्यापक आतंकवाद विरोधी नीति को जल्द से जल्द तैयार करने और लागू करने की मांग भी की गई है।
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण जीत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार के मुद्दे पर मिली है। ब्रिक्स देशों ने सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता का समर्थन किया है, जिससे भविष्य में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे को और अधिक मजबूती मिलने की संभावना है और इसी शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई मुलाकात ने भी द्विपक्षीय संबंधों में नई उम्मीद जगाई है। दोनों नेताओं ने सीमा पर शांति बनाए रखने और बातचीत के माध्यम से विवादों को सुलझाने पर जोर दिया है।
चीन और रूस के हितों का संरक्षण
चीन के दृष्टिकोण से देखें तो उसे अमेरिका की एकतरफा व्यापार नीतियों और टैरिफ के खिलाफ ब्रिक्स का मजबूत समर्थन मिला है। नई दिल्ली घोषणा पत्र में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। ब्रिक्स देशों का मानना है कि इस तरह के कदम वैश्विक व्यापार को बाधित करते हैं और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के स्थापित नियमों का उल्लंघन करते हैं। इसके साथ ही, भारत और चीन के बीच संबंधों में आई गर्माहट ने चीन को क्षेत्रीय स्थिरता के मोर्चे पर राहत दी है। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई है कि सीमा से जुड़े मतभेदों को बड़े विवाद का रूप नहीं लेने दिया जाएगा।
रूस के लिए यह सम्मेलन पश्चिमी देशों और G-7 के प्रभाव को संतुलित करने का एक बड़ा अवसर साबित हुआ। घोषणा पत्र में एकतरफा प्रतिबंधों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया है, जो सीधे तौर पर रूस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिशों का जवाब है और ब्रिक्स ने स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान केवल बातचीत, आपसी सलाह और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। यह रूस के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है क्योंकि इससे उसे एक ऐसे मंच का समर्थन मिला है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रखता है।
पश्चिम एशिया का नया समीकरण: ईरान, यूएई और सऊदी अरब
इस शिखर सम्मेलन की एक और खास बात ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब की सक्रिय भागीदारी रही और ईरान को ब्रिक्स के भीतर अन्य सदस्य देशों के समान महत्व दिया गया है। इजराइल और गाजा के बीच चल रहे संघर्ष पर भी ब्रिक्स ने कड़ा रुख अपनाते हुए शांति की अपील की है। यह पहली बार है जब ईरान, सऊदी अरब और यूएई जैसे देश, जिनके हित पश्चिम एशिया में अक्सर एक-दूसरे से टकराते हैं, एक ही मंच पर साथ खड़े नजर आए।
ब्रिक्स ने इन देशों के बीच संवाद के एक नए पुल के रूप में काम किया है और भारत, रूस और चीन जैसे देशों की मौजूदगी ने पश्चिम एशिया के इन देशों के बीच आपसी विश्वास बढ़ाने और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा करने की संभावनाओं को मजबूत किया है। अमेरिका की एकतरफा नीतियों के खिलाफ इन देशों का सामूहिक रुख यह दर्शाता है कि अब ये देश अपनी विदेश नीति में अधिक स्वायत्तता और विविधता चाहते हैं।
ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज
नई दिल्ली घोषणा पत्र के माध्यम से भारत ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि वह ग्लोबल साउथ की एक सशक्त आवाज बनकर उभरा है। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाने से लेकर दुनिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने तक, भारत ने अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया है। अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों के खिलाफ ब्रिक्स की एकजुटता ने इस समूह की एक स्वतंत्र और मजबूत पहचान को वैश्विक पटल पर स्थापित किया है। यह घोषणा पत्र केवल एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि एक बदलते हुए वर्ल्ड ऑर्डर की स्पष्ट तस्वीर है जहां विकासशील देश अपनी शर्तों पर वैश्विक एजेंडा तय कर रहे हैं।