दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में देर रात भूकंप के तेज झटके महसूस किए गए, जिससे लोगों में भारी दहशत फैल गई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, रात 10 बजकर 23 मिनट पर धरती अचानक कांपने लगी। रिक्टर स्केल पर इस भूकंप की तीव्रता 4 दशमलव 9 दर्ज की गई है। ये झटके दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद जैसे प्रमुख शहरों में इतने प्रभावी थे कि लोग अपने घरों से बाहर निकलकर सड़कों पर आ गए और कुछ समय के लिए इलाकों में अफरातफरी का माहौल देखा गया, हालांकि बाद में स्थिति सामान्य हो गई और लोग अपने घरों की ओर लौटे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हाउसिंग सोसायटियों का हाल
भूकंप का असर केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भी इसे स्पष्ट रूप से महसूस किया गया। गाजियाबाद, नोएडा और मेरठ जैसे शहरों की ऊंची हाउसिंग सोसायटियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा डरे हुए नजर आए। जैसे ही झटके महसूस हुए, लोग लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। सोसायटियों के पार्कों और खुली सड़कों पर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई। गनीमत यह रही कि झटके ज्यादा देर तक नहीं रहे, लेकिन 30 सेकंड की उस अवधि ने लोगों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया। ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों के लिए यह अनुभव काफी डरावना था।
अफगानिस्तान में था भूकंप का मुख्य केंद्र
वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, इस भूकंप का मुख्य केंद्र अफगानिस्तान में स्थित था और वहां रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 6 दशमलव 1 मापी गई थी। केंद्र में तीव्रता अधिक होने के कारण इसके झटके दूर-दराज के इलाकों तक महसूस किए गए। दिल्ली-एनसीआर में महसूस किए गए 4 दशमलव 9 तीव्रता के झटके इसी का परिणाम थे। ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों ने बताया कि उन्होंने लगभग 30 सेकंड तक कंपन महसूस किया, जिससे पंखे और घर का अन्य सामान हिलने लगा था। झटकों की अवधि लंबी होने के कारण लोगों को संभलने का मौका मिला और वे तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर निकल पड़े।
सिस्मिक जोन-4 में आता है दिल्ली-एनसीआर
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो नोएडा और दिल्ली-एनसीआर का पूरा इलाका भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। दिल्ली को सिस्मिक जोन-4 की श्रेणी में रखा गया है। इस जोन का मतलब है कि यह इलाका भूकंप के लिए काफी ज्यादा जोखिम वाला है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र में आने वाले छोटे-बड़े झटके भविष्य के लिए सतर्क रहने का संकेत देते हैं। यहां की घनी आबादी और ऊंची इमारतों के कारण भूकंप जैसी आपदा का जोखिम और भी बढ़ जाता है, इसलिए निर्माण कार्यों में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है।
नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी की रिपोर्ट
नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (एनसीएस) ने इस घटना पर विस्तृत जानकारी साझा की है। एनसीएस के आंकड़ों के अनुसार, 6 अक्टूबर को देश के विभिन्न हिस्सों और पड़ोसी क्षेत्रों में कई बार भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की गई हैं। इन सभी हालिया घटनाओं का विवरण विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराया गया है और राहत की बात यह है कि अभी तक किसी भी स्थान से जान-माल के बड़े नुकसान की कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है। फिलहाल सभी प्रभावित क्षेत्रों में हालात पूरी तरह से सामान्य हैं और प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
क्यों आती है भूकंप जैसी आपदा?
भूकंप आने के पीछे एक निश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया काम करती है। पृथ्वी की सतह के नीचे कुल सात टेक्टोनिक प्लेटें मौजूद हैं, जो लगातार अपनी जगह से हिलती रहती हैं। जिन स्थानों पर ये प्लेटें आपस में टकराती हैं, उन्हें 'फॉल्ट लाइन' कहा जाता है। जब ये प्लेटें बार-बार एक-दूसरे से टकराती हैं, तो उनके किनारे मुड़ने लगते हैं और वहां भारी दबाव पैदा हो जाता है। जब यह दबाव एक सीमा से अधिक हो जाता है, तो प्लेटें अचानक टूटने लगती हैं। इस प्रक्रिया में पृथ्वी के नीचे से ऊर्जा बाहर निकलने का रास्ता खोजती है, जिससे कंपन पैदा होता है और हमें भूकंप के झटके महसूस होते हैं। यही हलचल धरती की सतह पर तबाही या झटकों का कारण बनती है।