अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टॉर को एक बेहद तीखी और अप्रत्याशित चिट्ठी भेजी है। इस खत में ट्रंप ने नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर अपनी गहरी निराशा व्यक्त की है, जिसके बाद उन्होंने एक बड़ा 'खुलासा' करते हुए कहा है कि अब उन पर दुनिया में शांति स्थापित करने की कोई जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अब उनका पूरा ध्यान केवल अमेरिकी हितों को प्राथमिकता देने पर होगा और यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय में शांति और सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
नोबेल शांति पुरस्कार पर ट्रंप की नाराजगी
डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था, लेकिन उन्हें यह सम्मान नहीं मिला और इस बात को लेकर उनकी नाराजगी इस चिट्ठी में साफ झलकती है। हाल ही में, वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो ने उन्हें 'नोबेल शांति पुरस्कार' सौंपा था, हालांकि यह एक प्रतीकात्मक इशारा था और इसका कोई आधिकारिक महत्व नहीं था। नॉर्वे की नोबेल समिति ने इस संबंध में स्पष्ट किया था कि एक बार पुरस्कार की घोषणा हो जाने के बाद, इसे न तो बदला जा सकता है और न ही किसी और के नाम किया जा सकता है और ट्रंप की चिट्ठी इस बात का प्रमाण है कि वह इस निर्णय से कितने निराश थे और उन्होंने इसे अपनी नीतियों में बदलाव के एक कारण के रूप में प्रस्तुत किया है।
अमेरिकी हितों को प्राथमिकता और 'आजादी' का ऐलान
नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के कर्मचारियों द्वारा कई दूतावासों को भेजी गई इस चिट्ठी में ट्रंप ने कहा है कि नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने के बाद उन्हें 'आजादी' मिल गई है और इस 'आजादी' का अर्थ उनके लिए यह है कि अब वे बिना किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव या शांति की वैश्विक जिम्मेदारी के अमेरिकी हितों को पूरी तरह से प्राथमिकता दे सकते हैं। यह बयान उनकी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का एक और विस्तार प्रतीत होता है,। जिसमें वे घरेलू और राष्ट्रीय हितों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ऊपर रखते हैं। इस तरह का रुख वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है, जहां अमेरिका की भूमिका को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ सकती है।
चिट्ठी में डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर डेनमार्क की संप्रभुता पर भी सवाल उठाए हैं, जो एक बेहद चौंकाने वाला कदम है। उन्होंने तर्क दिया कि कोपेनहेगन रूस या चीन जैसे देशों से इस क्षेत्र की ठीक से रक्षा नहीं कर सकता। इसके साथ ही, उन्होंने ग्रीनलैंड पर डेनिश स्वामित्व के ऐतिहासिक आधार को भी चुनौती दी। ट्रंप ने पहले भी ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी, जिसे डेनमार्क ने सिरे से खारिज कर दिया था और उनका यह नया बयान इस मुद्दे को फिर से गरमा सकता है और डेनमार्क के साथ अमेरिका के संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है। ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है, और ट्रंप का यह दावा भू-राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
नाटो पर ट्रंप का दबाव और सुरक्षा का तर्क
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी चिट्ठी में यह भी दावा किया कि उन्होंने नाटो (NATO) की स्थापना के बाद से किसी और की तुलना में इसके लिए ज्यादा काम किया है और उन्होंने जोर दिया कि अब गठबंधन को भी ऐसा ही करना चाहिए, यानी अपनी जिम्मेदारियों को और अधिक गंभीरता से लेना चाहिए। ट्रंप लंबे समय से नाटो के सदस्य देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने का दबाव डालते रहे हैं। इस चिट्ठी में उन्होंने एक और विवादास्पद बयान दिया है, जिसमें कहा गया है, "जब तक ग्रीनलैंड पर हमारा पूरा और कुल नियंत्रण नहीं होगा, दुनिया सुरक्षित नहीं है। " यह बयान नाटो के भीतर और बाहर दोनों जगह सुरक्षा अवधारणाओं पर गंभीर बहस छेड़ सकता है, खासकर ग्रीनलैंड के सामरिक महत्व को देखते हुए।
टैरिफ वॉर और नॉर्वे के साथ तनाव
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब उनकी ओर से घोषित टैरिफ की आलोचना नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टॉर ने की थी और स्टॉर ने कहा था कि सहयोगियों के बीच धमकियों की कोई जगह नहीं है। नॉर्वे उन आठ यूरोपीय देशों में से है जो ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ से प्रभावित हुए हैं, जिनमें डेनमार्क, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, फिनलैंड, नीदरलैंड और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। इन टैरिफ के तहत, 1 फरवरी से 10 प्रतिशत शुल्क लागू होने वाला है, जो 1 जून को बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाएगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि ये शुल्क तब तक रहेंगे जब तक ग्रीनलैंड की 'पूरी और कुल खरीद' के लिए कोई समझौता नहीं हो जाता। यह टैरिफ वॉर न केवल आर्थिक बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी तनाव बढ़ा रहा है, और ग्रीनलैंड का मुद्दा इसमें एक केंद्रीय भूमिका निभा रहा है और ट्रंप का यह रुख अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है, जहां व्यक्तिगत नाराजगी और राष्ट्रीय हित आपस में गुंथे हुए दिखाई देते हैं।