अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल के पहले 12 महीनों के भीतर सात अलग-अलग देशों पर सैन्य हमले कर एक नया रिकॉर्ड स्थापित किया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में ट्रंप द्वारा मंजूर किए गए हवाई हमलों की संख्या राष्ट्रपति जो बाइडेन के पूरे चार साल के कार्यकाल के दौरान किए गए हमलों से भी अधिक हो गई है। यह स्थिति तब उत्पन्न हुई है जब ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान खुद को एक युद्ध विरोधी नेता के रूप में प्रस्तुत किया था और वादा किया था कि वे अमेरिका को नए अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में नहीं झोंकेंगे।
व्हाइट हाउस के अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन की वर्तमान सैन्य नीति 'शक्ति के माध्यम से शांति' (Peace through Strength) के सिद्धांत पर आधारित है। प्रशासन का तर्क है कि कूटनीतिक रास्ते विफल होने के बाद ही सैन्य बल का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, ईरान, नाइजीरिया और वेनेजुएला जैसे देशों में शुरू की गई नई सैन्य कार्रवाइयों ने वाशिंगटन में एक बड़ी राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। विशेष रूप से ईरान के खिलाफ शुरू किया गया 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' आधुनिक इतिहास का सबसे आक्रामक अमेरिकी सैन्य अभियान माना जा रहा है।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी: ईरान के खिलाफ सबसे बड़ी सैन्य कार्रवाई
ईरान के खिलाफ चल रहा मौजूदा अभियान 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' अमेरिका और इजरायल का एक संयुक्त सैन्य ऑपरेशन है। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, इस अभियान का प्राथमिक उद्देश्य ईरान की वर्तमान सरकार का तख्तापलट करना और उसकी सैन्य क्षमताओं को नष्ट करना है। ट्रंप ने इस अभियान की शुरुआत बिना अमेरिकी कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी के की है, जो संवैधानिक स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है और 2003 के इराक युद्ध के बाद यह पहली बार है जब मध्य पूर्व में इतनी बड़ी संख्या में अमेरिकी सैन्य संसाधनों को तैनात किया गया है।
इस अभियान के पहले 24 घंटों के भीतर इजरायली और अमेरिकी हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि यह अभियान लगभग चार सप्ताह तक चल सकता है। इसका मुख्य लक्ष्य ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल उद्योग, उसकी नौसेना और परमाणु बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से समाप्त करना है। जवाब में, ईरान ने खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले शुरू कर दिए हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
नाइजीरिया और वेनेजुएला: नए सैन्य मोर्चों का विस्तार
ट्रंप प्रशासन ने केवल मध्य पूर्व तक ही अपनी सैन्य कार्रवाइयों को सीमित नहीं रखा है। आधुनिक अमेरिकी इतिहास में पहली बार नाइजीरिया और वेनेजुएला जैसे देशों में भी प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप किया गया है। क्रिसमस के दिन नाइजीरिया में किए गए हवाई हमलों को प्रशासन ने आतंकवाद विरोधी कार्रवाई बताया। वहीं, वेनेजुएला में एक साहसिक सैन्य अभियान के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को कराकस से हिरासत में ले लिया गया। इसके अतिरिक्त, कैरिबियाई क्षेत्र में नशीली दवाओं की तस्करी रोकने के लिए अमेरिकी नौसेना ने कई संदिग्ध नौकाओं को डुबोने की कार्रवाई की है।
इन कार्रवाइयों को ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसमें वे लंबे समय तक चलने वाले 'अंतहीन युद्धों' के बजाय कम समय में भारी सैन्य शक्ति के इस्तेमाल को प्राथमिकता देते हैं। व्हाइट हाउस का कहना है कि वे जमीनी सेना भेजने के बजाय हवाई हमलों और विशेष ऑपरेशनों के जरिए अमेरिकी हितों की रक्षा कर रहे हैं। हालांकि, इन नए मोर्चों के खुलने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की विदेश नीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
सैन्य हताहत और राष्ट्रपति ट्रंप का आधिकारिक बयान
ईरान में शुरू हुए ऑपरेशन के शुरुआती चरण में ही अमेरिका को मानवीय क्षति उठानी पड़ी है। आधिकारिक पुष्टि के अनुसार, अब तक चार अमेरिकी सैनिकों की मौत हो चुकी है। ट्रंप ने एक वीडियो संदेश के माध्यम से देश को संबोधित करते हुए इन मौतों पर दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह एक कठिन वास्तविकता है कि अभियान के समाप्त होने से पहले और भी जानें जा सकती हैं। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि मारे गए सैनिकों का बदला लिया जाएगा और वे हताहतों की संख्या को कम करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे।
सैनिकों की मौत के बाद अमेरिका में युद्ध विरोधी प्रदर्शनों और राजनीतिक आलोचनाओं में तेजी आई है। आलोचकों का कहना है कि ट्रंप की 'त्वरित कार्रवाई' की नीति अमेरिकी सैनिकों को अनावश्यक जोखिम में डाल रही है। प्रशासन ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य था और इसके लिए किसी भी स्तर की सैन्य शक्ति का उपयोग किया जा सकता है।
अमेरिकी राजनीति में युद्ध को लेकर बढ़ता आंतरिक मतभेद
ट्रंप की इन सैन्य कार्रवाइयों ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद पैदा कर दिए हैं। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जिन्होंने पहले ट्रंप की विदेश नीति की सराहना करते हुए कहा था कि उन्होंने कोई नया युद्ध शुरू नहीं किया, अब इस नई आक्रामक नीति का बचाव कर रहे हैं और दूसरी ओर, टकर कार्लसन जैसे प्रभावशाली मीडिया कमेंटेटरों ने ईरान पर हमले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे एक अनावश्यक संघर्ष करार दिया है जो अमेरिकी संसाधनों की बर्बादी है।
कांग्रेस के कई सदस्यों ने राष्ट्रपति द्वारा युद्ध की शक्तियों (War Powers) के उपयोग पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि बिना विधायी मंजूरी के इतने बड़े पैमाने पर युद्ध शुरू करना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन है। व्हाइट हाउस ने इन आपत्तियों का जवाब देते हुए कहा है कि राष्ट्रपति के पास राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करने का संवैधानिक अधिकार है। यह बहस अब वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में केंद्र बिंदु बन गई है।
ट्रंप प्रशासन की नई युद्ध रणनीति और उसके उद्देश्य
डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध रणनीति पिछले राष्ट्रपतियों से काफी भिन्न दिखाई दे रही है। जहां जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने बड़े पैमाने पर जमीनी आक्रमण किए और बराक ओबामा ने ड्रोन हमलों पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं ट्रंप 'सर्जिकल स्ट्राइक' और 'मैसिव एयर पावर' के संयोजन का उपयोग कर रहे हैं। उनकी रणनीति का मुख्य उद्देश्य दुश्मन को संभलने का मौका दिए बिना उसके नेतृत्व और बुनियादी ढांचे को नष्ट करना है।
प्रशासन का दावा है कि वे किसी देश पर कब्जा करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि केवल उन खतरों को खत्म करने के लिए हमला कर रहे हैं जो सीधे तौर पर अमेरिका को चुनौती देते हैं। ईरान के मामले में, लक्ष्य स्पष्ट रूप से शासन परिवर्तन है। ट्रंप का मानना है कि जब तक ईरान में वर्तमान नेतृत्व सत्ता में है, तब तक मध्य पूर्व में शांति संभव नहीं है और आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि क्या यह रणनीति अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रहती है या अमेरिका एक और लंबे क्षेत्रीय संघर्ष में फंस जाता है।