फ्रांस में भीषण गर्मी का तांडव: पेरिस में टूटा 147 साल का रिकॉर्ड, पारा 44.3 डिग्री के पार

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फ्रांस में भीषण गर्मी का तांडव: पेरिस में टूटा 147 साल का रिकॉर्ड, पारा 44.3 डिग्री के पार
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फ्रांस इस समय एक अभूतपूर्व और रिकॉर्डतोड़ हीटवेव की चपेट में है, जिसने पूरे देश में जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। राजधानी पेरिस में गर्मी का ऐसा आलम है जो पिछले 147 वर्षों के इतिहास में कभी नहीं देखा गया। 1872 से 2019 के बीच के आंकड़ों को देखें तो इस बार की गर्मी ने सभी पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। इस हफ्ते पेरिस ने 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले इतने दिन देखे हैं, जितने पिछले डेढ़ सौ साल में भी दर्ज नहीं किए गए थे। फ्रांस के पिस्सॉस में पारा 44 दशमलव 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जबकि पूरे फ्रांस का राष्ट्रीय औसत तापमान 29 दशमलव 8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया है।

हीट इमरजेंसी और जनहानि

फ्रांस के आधे से ज्यादा हिस्से में इस समय रेड हीट अलर्ट जारी किया गया है। इस भीषण गर्मी के कारण अब तक 40 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। गर्मी से राहत पाने के लिए लोग नदियों और झीलों का रुख कर रहे हैं, जिसके कारण डूबने की घटनाओं में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। प्रशासन ने लोगों को घरों के अंदर रहने और हाइड्रेटेड रहने की सलाह दी है, क्योंकि स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है।

क्या है हीट डोम और यह कैसे काम करता है?

फ्रांस के अचानक हीट-चैंबर बनने के पीछे सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण हीट डोम को माना जा रहा है। मौसम विज्ञान में इसे एक हाई-प्रेशर ब्लॉकिंग सिस्टम कहा जाता है। जब वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर एक मजबूत हाई प्रेशर जोन बनता है, तो वह एक ढक्कन की तरह काम करता है। यह गर्म हवा को एक निश्चित दायरे में कैद कर लेता है और उसे बाहर नहीं निकलने देता। यह गर्म हवा नीचे की ओर दबती है और जैसे-जैसे हवा नीचे आती है, उसका घनत्व बढ़ता जाता है और वह और अधिक गर्म होती जाती है। फ्रांस के ऊपर यह डोम कई दिनों से बना हुआ है, जिससे तापमान हर दिन नए रिकॉर्ड बना रहा है।

यूरोप में गर्मी के खतरनाक होने के कारण

यूरोप में गर्मी केवल बढ़ते पारे की वजह से ही नहीं, बल्कि वहां की भौगोलिक और ढांचागत स्थितियों के कारण भी ज्यादा परेशान करती है और यूरोपीय घरों की बनावट सर्दियों के अनुकूल होती है, जहां मोटी दीवारें और इन्सुलेशन गर्मी को अंदर ही रोक लेते हैं, जिससे गर्मियों में घर के अंदर का तापमान बाहर नहीं निकल पाता। इसके अलावा, यूरोप में एयर कंडीशनिंग का इस्तेमाल बहुत कम होता है। शहरों में कंक्रीट की इमारतें और सड़कें दिनभर गर्मी सोखती हैं, जिसे अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है। उमस के कारण शरीर का पसीना जल्दी नहीं सूखता, जिससे शरीर को ठंडा होने में कठिनाई होती है।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और वैज्ञानिकों की चेतावनी

वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन के वैज्ञानिकों का विश्लेषण बताता है कि फ्रांस जैसी भीषण गर्मी 1976 में लगभग असंभव थी। वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर उस समय ऐसी हीटवेव आती भी, तो तापमान आज की तुलना में करीब 3 दशमलव 5 डिग्री सेल्सियस कम होता। इसका स्पष्ट अर्थ है कि जलवायु परिवर्तन ने गर्मी की तीव्रता को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। एक और बड़ी चिंता ट्रॉपिकल नाइट्स को लेकर है, यानी ऐसी रातें जब तापमान बहुत ऊंचा रहता है। रात में गर्मी कम न होने से शरीर को आराम नहीं मिल पाता, जिससे हीट स्ट्रोक और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

भविष्य की राह और समाधान

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस भीषण गर्मी के पीछे अल-नीनो नहीं, बल्कि मानव-जनित जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधनों का बढ़ता इस्तेमाल जिम्मेदार है। कोयला, तेल और गैस के जलने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें धरती को तेजी से गर्म कर रही हैं। यूरोप दुनिया के औसत की तुलना में करीब दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है और इसका समाधान केवल सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ विकल्पों को अपनाने में है। साथ ही, जंगलों की रक्षा और शहरों में हरियाली बढ़ाना अनिवार्य हो गया है। अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसी घातक हीटवेव और भी सामान्य और लंबी हो जाएंगी।

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