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वैश्विक तनाव के बीच सोने की कीमतों में गिरावट, जानें प्रमुख कारण

वैश्विक तनाव के बीच सोने की कीमतों में गिरावट, जानें प्रमुख कारण
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पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक सर्राफा बाजार में एक अप्रत्याशित रुझान देखने को मिल रहा है। सामान्यतः युद्ध या अस्थिरता की स्थिति में सोने की कीमतों में उछाल आता है, लेकिन वर्तमान में इसके विपरीत कीमतें नीचे गिर रही हैं और भारतीय बाजारों में भी 24-कैरेट सोने के भाव में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। बाजार के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमतें जो कुछ समय पहले रिकॉर्ड ऊंचाई पर थीं, अब उनमें सुधार देखा जा रहा है। यह स्थिति उन निवेशकों के लिए आश्चर्यजनक है जो सोने को संकट के समय का सबसे सुरक्षित ठिकाना मानते हैं।

ऐतिहासिक रूप से, 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट, 2020 की कोविड-19 महामारी और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान सोने ने एक सुरक्षित निवेश के रूप में अपनी भूमिका निभाई थी। उन अवधियों में निवेशकों ने जोखिम वाली संपत्तियों से पैसा निकालकर सोने में निवेश किया था, जिससे कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं। हालांकि, वर्तमान पश्चिम एशिया संकट के दौरान बाजार की प्रतिक्रिया भिन्न है और इस बार निवेशक सोने के बजाय अन्य वित्तीय साधनों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं, जिससे सोने की मांग और कीमतों पर सीधा असर पड़ा है।

अमेरिकी डॉलर की मजबूती और बॉन्ड यील्ड का प्रभाव

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में आई मजबूती सोने की कीमतों पर दबाव डालने वाला प्राथमिक कारक है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने का मूल्य डॉलर में निर्धारित होता है, इसलिए जब डॉलर अन्य प्रमुख मुद्राओं की तुलना में मजबूत होता है, तो विदेशी खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप वैश्विक मांग में कमी आती है और कीमतें गिरती हैं। इसके साथ ही, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड में हुई वृद्धि ने भी सोने के आकर्षण को कम किया है। निवेशक अब सोने जैसे गैर-ब्याज वाली संपत्ति के बजाय सरकारी बॉन्ड में निवेश करना पसंद कर रहे हैं, जो निश्चित और सुरक्षित रिटर्न प्रदान करते हैं। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो सोने को रखने की अवसर लागत बढ़ जाती है, जिससे बड़े फंड मैनेजर सोने की बिकवाली करते हैं।

कच्चे तेल की कीमतें और मुद्रास्फीति का संबंध

पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की कीमतों में वृद्धि से वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति (महंगाई) बढ़ने का खतरा पैदा होता है। इस महंगाई को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक, विशेष रूप से अमेरिकी फेडरल रिजर्व, ब्याज दरों को उच्च स्तर पर बनाए रख सकते हैं। उच्च ब्याज दरें सोने के लिए नकारात्मक मानी जाती हैं क्योंकि यह निवेश की अवसर लागत को बढ़ा देती हैं और जब ब्याज दरें अधिक होती हैं, तो निवेशक बैंक जमा और बॉन्ड जैसे विकल्पों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे सोने की मांग और कीमत दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। तेल की बढ़ती कीमतों ने डॉलर की मांग को भी बढ़ाया है, क्योंकि अधिकांश देश तेल का आयात डॉलर में ही करते हैं।

मुनाफावसूली और लिक्विडिटी की आवश्यकता

वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि सोने की कीमतों में हालिया गिरावट का एक बड़ा कारण बड़े निवेशकों द्वारा की जा रही मुनाफावसूली है। पिछले कुछ वर्षों में सोने ने निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया है, जिससे कीमतें अपने सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब पहुंच गई थीं। वर्तमान अनिश्चितता के बीच, कई संस्थागत निवेशकों ने अपने लाभ को सुरक्षित करने के लिए सोने की बिकवाली शुरू कर दी है। इसके अलावा, वैश्विक शेयर बाजारों में आई गिरावट के कारण निवेशकों को मार्जिन कॉल का सामना करना पड़ा है। इस नकदी की जरूरत को पूरा करने के लिए निवेशकों ने अपने सोने के भंडार को बेचकर फंड जुटाया है, जिससे बाजार में सोने की आपूर्ति बढ़ गई है और कीमतों में गिरावट आई है।

भारतीय बाजार की स्थिति और घरेलू मांग

भारत में सोने की कीमतों पर वैश्विक कारकों के साथ-साथ घरेलू मांग और विनिमय दर का भी गहरा असर पड़ता है। हाल के दिनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट के लाभ को कुछ हद तक सीमित किया है। हालांकि, घरेलू स्तर पर ज्वेलरी की मांग में थोड़ी सुस्ती देखी गई है क्योंकि उपभोक्ता कीमतों के और अधिक स्थिर होने का इंतजार कर रहे हैं। इसके विपरीत, डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ईटीएफ में निवेश का प्रवाह बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, आगामी त्योहारी और वैवाहिक सीजन से पहले कीमतों में यह सुधार घरेलू मांग को पुनर्जीवित कर सकता है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता है, इसलिए यहां की मांग वैश्विक कीमतों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

केंद्रीय बैंकों की रणनीति और वैश्विक व्यापार

विश्व स्वर्ण परिषद की रिपोर्टों के अनुसार, विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की खरीद की गति में भी बदलाव आया है। हालांकि कई केंद्रीय बैंक अभी भी अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने को शामिल कर रहे हैं, लेकिन उनकी खरीद की मात्रा में उतार-चढ़ाव देखा गया है। इसके अलावा, वैश्विक व्यापार में डॉलर की बढ़ती मांग ने सोने की तरलता पर असर डाला है और संकट के समय में अब डॉलर को भी एक सुरक्षित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, विशेष रूप से उन देशों के लिए जिन्हें तेल आयात के लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होती है। यह बदलता वैश्विक आर्थिक ढांचा सोने की पारंपरिक छवि को चुनौती दे रहा है और कीमतों को नियंत्रित कर रहा है।

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