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भारत-रूस के बीच नई LNG डील की तैयारी, ऊर्जा सुरक्षा पर जोर

भारत-रूस के बीच नई LNG डील की तैयारी, ऊर्जा सुरक्षा पर जोर
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भारत और रूस अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से एक नई लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) डील की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में संभावित आपूर्ति बाधाओं के बीच, नई दिल्ली और मॉस्को सीधे गैस व्यापार को फिर से शुरू करने के लिए बातचीत कर रहे हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, यह कदम भारत की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने और वैश्विक बाजार में होने वाली अस्थिरता से बचने के लिए उठाया जा रहा है।

यूक्रेन संघर्ष के बाद यह पहली बार है जब दोनों देश सीधे LNG आयात के लिए बड़े पैमाने पर समझौता करने की तैयारी कर रहे हैं। भारत अपनी गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, और रूस के साथ यह संभावित समझौता भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों से निपटने में सहायक हो सकता है।

उच्चस्तरीय वार्ता और द्विपक्षीय सहयोग

इस रणनीतिक समझौते को लेकर 19 मार्च को नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में रूस के उप ऊर्जा मंत्री और भारत के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हिस्सा लिया। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, दोनों पक्षों ने ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों पर विस्तृत चर्चा की। माना जा रहा है कि यदि बातचीत इसी गति से आगे बढ़ती है, तो अगले कुछ हफ्तों में इस समझौते को अंतिम रूप दिया जा सकता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट और भारत की चिंता

भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। आंकड़ों के अनुसार, भारत का लगभग 50% कच्चा तेल और LNG आयात इसी मार्ग से होकर आता है। पश्चिम एशिया में हालिया तनाव के कारण इस समुद्री मार्ग पर सुरक्षा जोखिम बढ़ गए हैं। किसी भी प्रकार की रुकावट भारत की घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है। रूस से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति इस लिहाज से सुरक्षित मानी जा रही है क्योंकि इसके लिए वैकल्पिक मार्गों का उपयोग किया जा सकता है जो होर्मुज पर निर्भर नहीं हैं।

आयात रणनीति में बदलाव और रूसी तेल की भूमिका

भारत ने हाल के महीनों में अपनी ऊर्जा आयात रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं और इस साल की शुरुआत में रूस से तेल आयात में मामूली गिरावट देखी गई थी, लेकिन अब इसे फिर से बढ़ाने की योजना है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाकर अपनी कुल जरूरत का लगभग 40% तक ले जा सकता है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से अब तक लगभग $44 billion मूल्य का कच्चा तेल खरीदा है, जो दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापारिक संबंधों को दर्शाता है।

वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों और प्रतिबंधों पर चर्चा

भारत सरकार ने घरेलू आयातकों को रूस से LNG खरीद की संभावनाओं के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधों की जटिलताओं को देखते हुए भारत अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ संभावित 'सेंक्शन वेवर' (छूट) पर भी बातचीत कर रहा है। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन किए बिना देश की ऊर्जा मांग को पूरा किया जा सके और रूस के अलावा अन्य देशों से भी आपूर्ति बढ़ाने के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के मायने

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर भारत की मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे को प्रभावित करता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है। ऐसी स्थिति में, रूस के साथ दीर्घकालिक LNG समझौता भारत को मूल्य स्थिरता प्रदान करने और आर्थिक विकास की गति को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

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