Greenland Dispute: डेनमार्क ने भारत से मांगा समर्थन, ट्रंप की धमकियों पर कहा- 'अमेरिका से खतरा'

Greenland Dispute - डेनमार्क ने भारत से मांगा समर्थन, ट्रंप की धमकियों पर कहा- 'अमेरिका से खतरा'
| Updated on: 10-Jan-2026 09:09 AM IST
हाल ही में, ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच तनाव काफी बढ़ गया है, जिसके बाद डेनमार्क ने इस संवेदनशील मामले में भारत से समर्थन की अपील की है। डेनिश सांसद और रक्षा समिति के अध्यक्ष रास्मस जारलोव ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जे की धमकियों की कड़ी निंदा की है। जारलोव ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अमेरिका का यह दावा पूरी तरह से गलत है और चीन-रूस के खतरे का तर्क भी झूठा है। उन्होंने इस मुद्दे को केवल डेनमार्क और अमेरिका के बीच का मामला न मानते हुए, इसे वैश्विक संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बताया है, जिस पर पूरी दुनिया की शांति और व्यवस्था निर्भर करती है।

ट्रंप का ग्रीनलैंड पर बढ़ता दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड पर अपना दावा तेज कर दिया है, जिससे डेनमार्क में हड़कंप मच गया है। यह कोई नया मामला नहीं है; ट्रंप ने 2019 में भी इस विशाल आर्कटिक द्वीप को खरीदने की पेशकश की थी, जिसे डेनमार्क ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया था और डेनमार्क ने तब भी कहा था कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और यह उसका एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है। हाल ही में, वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अपना दबाव और बढ़ा दिया है और उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कहा है कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की आवश्यकता है, और यदि आवश्यक हुआ तो सैन्य बल का उपयोग भी किया जा सकता है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि डेनमार्क 'प्यार से' सहमत। नहीं होता है, तो अमेरिका इस द्वीप पर जबरन कब्जा कर लेगा। यह बयान अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक गंभीर उल्लंघन का संकेत देता है और एक सहयोगी देश के प्रति आक्रामक रवैया दर्शाता है।

डेनमार्क की कड़ी निंदा

ट्रंप प्रशासन के इन आक्रामक दावों की डेनमार्क में कड़ी निंदा हो रही है और डेनमार्क की रक्षा समिति के अध्यक्ष और सांसद रास्मस जारलोव ने एक साक्षात्कार में ट्रंप प्रशासन के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि यह डेनमार्क का एक अभिन्न अंग है। जारलोव ने कहा कि ग्रीनलैंड पर कोई खतरा नहीं है और न ही किसी से कोई दुश्मनी है, इसलिए ट्रंप के हमले की कोई वैध वजह नहीं है। उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि अमेरिका के पास पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य और अन्य तरीकों से पहुंच है, और वहां कोई। ड्रग रूट, कोई गैरकानूनी सरकार, कोई ऐतिहासिक मालिकाना हक या कोई टूटा हुआ समझौता नहीं है जो इस तरह के जबरन कब्जे को उचित ठहरा सके।

भारत से समर्थन की अपील

रास्मस जारलोव ने इस मामले में भारत से समर्थन की अपील करते हुए कहा कि भले ही ग्रीनलैंड भारत से भौगोलिक रूप से बहुत दूर है, लेकिन यहां बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत दांव पर लगे हैं। उन्होंने भारत से सवाल किया कि क्या वह यह स्वीकार करेगा कि कोई विदेशी ताकत उसके किसी इलाके पर सैन्य बल से या स्थानीय लोगों को रिश्वत देकर कब्जा करने की कोशिश करे? जारलोव का मानना है कि भारत ऐसी किसी भी हरकत से बहुत नाराज होगा, और हर देश को ऐसा ही होना चाहिए और उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत भी डेनमार्क का साथ देगा, क्योंकि यह पूरी दुनिया के हित में है। जारलोव ने चेतावनी दी कि यदि हम इसे सामान्य बना देंगे कि कोई भी देश किसी के भी इलाके पर कब्जा कर सकता है, तो दुनिया बहुत अराजक हो जाएगी और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी।

सहयोगी देशों को धमकी

जारलोव ने वेनेजुएला की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका ने अब एक नया तेवर अपना लिया है और अपने ही सहयोगी देशों को धमकी दे रहा है। उन्होंने बताया कि ये वे देश हैं जिन्होंने अमेरिका के खिलाफ कभी कुछ नहीं किया, बल्कि हमेशा उसके वफादार सहयोगी रहे हैं। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक खतरनाक मिसाल कायम करती है, जहां एक महाशक्ति अपने सहयोगियों की संप्रभुता का सम्मान करने के बजाय उन पर दबाव डाल रही है। यह अमेरिका की विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत। देता है, जो वैश्विक स्थिरता के लिए चिंता का विषय है।

चीन-रूस के खतरे का खंडन

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया था कि ग्रीनलैंड रूस या चीन के मिसाइल हमलों से अमेरिका और दुनिया की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। जारलोव ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया और उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड पर कोई खतरा नहीं है, और असली खतरा केवल अमेरिका से है। जारलोव ने चीन के खतरे की बात को झूठा बताया, यह कहते हुए कि वहां चीन की कोई गतिविधि नहीं है, न कोई दूतावास, न खनन, न सैन्य मौजूदगी। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि ग्रीनलैंड में चाइनीज रेस्तरां ढूंढना भी मुश्किल है। उन्होंने तर्क दिया कि यदि वाकई कोई खतरा होता, तो अमेरिका। ने ग्रीनलैंड में अपनी सेना 99 प्रतिशत कम नहीं की होती। पहले वहां 15,000 सैनिक थे, अब सिर्फ 150 रखे हैं। इससे साफ है कि रूस या चीन का कोई बड़ा खतरा नहीं है, और अमेरिकी दावे निराधार हैं।

ग्रीनलैंड आर्कटिक में स्थित एक विशाल और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण द्वीप है। यह डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है और अपने दुर्लभ खनिज संसाधनों के लिए जाना जाता है। इस पूरे इलाके में यूरेनियम और आयरन जैसे प्राकृतिक संसाधनों का। प्रचुर भंडार है, जो इसे भू-राजनीतिक रूप से अत्यंत मूल्यवान बनाता है। इसकी आर्कटिक में स्थिति इसे सैन्य और व्यापारिक मार्गों के लिए भी महत्वपूर्ण बनाती है, जिससे वैश्विक शक्तियों की इसमें रुचि स्वाभाविक है। हालांकि, डेनमार्क का मानना है कि इन संसाधनों पर उसका और ग्रीनलैंड के लोगों का संप्रभु अधिकार है, और किसी भी बाहरी शक्ति को जबरन कब्जा करने का कोई अधिकार नहीं है और यह विवाद अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है।

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