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बीमा कंपनी की मनमानी पर बेटे की जीत पिता को शराबी बताकर खारिज किया था क्लेम

बीमा कंपनी की मनमानी पर बेटे की जीत पिता को शराबी बताकर खारिज किया था क्लेम
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बीमा कंपनियों की मनमानी और दावों को खारिज करने के अनुचित रवैये के खिलाफ एक बेटे ने बड़ी कानूनी जीत हासिल की है। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने पिता के इलाज के लिए किए गए स्वास्थ्य बीमा दावे को खारिज करने के एचडीएफसी एर्गो जनरल इंश्योरेंस के फैसले को चुनौती दी थी। बीमा कंपनी ने मरीज को शराबी बताते हुए क्लेम देने से मना कर दिया था, लेकिन उपभोक्ता आयोग ने इस दलील को खारिज कर दिया। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनी को 6 लाख रुपये की राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का कड़ा आदेश दिया है। यह मामला दर्शाता है कि यदि पॉलिसीधारक के पास सही दस्तावेज हों, तो कंपनियों की मनमानी को रोका जा सकता है।

क्या था पूरा मामला और हिंसक हमला

यह पूरा मामला आंध्र प्रदेश के रहने वाले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के परिवार से जुड़ा है। 25 जून 2024 को शिकायतकर्ता के माता-पिता पर उनके कुछ रिश्तेदारों और अन्य लोगों ने चाकू और लोहे की रॉड से जानलेवा हमला कर दिया था। इस दुखद घटना में इंजीनियर की मां की मृत्यु हो गई, जबकि उनके पिता गंभीर रूप से घायल हो गए और पिता की गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें पहले सरकारी अस्पताल ले जाया गया और फिर बेहतर इलाज के लिए हैदराबाद के कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल्स में भर्ती कराया गया। इलाज के दौरान उन्हें लंबे समय तक आईसीयू में रखा गया। इस पूरे इलाज पर परिवार ने लगभग 10 लाख 17 हजार रुपये खर्च किए।

बीमा पॉलिसी और क्लेम खारिज होने का कारण

सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने पिता के लिए साल 2019 से एचडीएफसी एर्गो की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रखी थी। यह पॉलिसी 25 मार्च 2024 से 24 मार्च 2025 तक के लिए वैध थी, जिसके लिए 42,750 रुपये का प्रीमियम भी भरा गया था। विवाद तब पैदा हुआ जब अस्पताल की शुरुआती डिस्चार्ज समरी में "Alcohol Withdrawal Psychosis" यानी शराब छोड़ने से जुड़ी मानसिक स्थिति का जिक्र कर दिया गया। इसी टिप्पणी को आधार बनाकर बीमा कंपनी ने दावा किया कि मरीज ने अपने शराब पीने के इतिहास को छिपाया था। कंपनी ने न केवल 6 लाख रुपये का क्लेम खारिज कर दिया, बल्कि पॉलिसी को भी रद्द कर दिया।

अस्पताल की गलती और डॉक्टर का स्पष्टीकरण

बेटे ने कंपनी के इस फैसले का विरोध किया और स्पष्ट किया कि उनके पिता ने कभी शराब का सेवन नहीं किया था और बाद में इलाज करने वाले डॉक्टरों और कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल्स ने लिखित रूप में यह स्पष्टीकरण दिया कि मरीज की भ्रम और सुस्ती की स्थिति शराब की वजह से नहीं थी। डॉक्टरों ने बताया कि यह स्थिति किडनी की गंभीर बीमारी, एनीमिया और हमले से हुए शारीरिक व मानसिक आघात के कारण उत्पन्न हुई थी। अस्पताल ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए डिस्चार्ज समरी में संशोधन किया और विवादित टिप्पणी को हटा दिया। इसके बावजूद बीमा कंपनी अपने फैसले पर अड़ी रही, जिसके बाद मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचा।

आयोग का फैसला और मुआवजे का आदेश

उपभोक्ता आयोग ने मामले की सुनवाई के बाद पाया कि बीमा कंपनी ने केवल शुरुआती डिस्चार्ज समरी के आधार पर जल्दबाजी में क्लेम खारिज किया, जबकि बाद में डॉक्टरों ने लिखित स्पष्टीकरण दे दिया था। आयोग ने बीमा कंपनी के इस रवैये को मनमाना और सेवा में कमी करार दिया। आयोग ने एचडीएफसी एर्गो को आदेश दिया कि वह 6 लाख रुपये का मेडिकल क्लेम 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ चुकाए। इसके साथ ही, आयोग ने कॉन्टिनेंटल हॉस्पिटल्स को भी लापरवाही का दोषी माना क्योंकि उन्होंने बिना पर्याप्त पुष्टि के ऐसी टिप्पणी दर्ज की थी। अस्पताल को निर्देश दिया गया कि वह परिवार को हुई मानसिक पीड़ा के लिए 1 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 25,000 रुपये का भुगतान करे।

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