होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है और यह स्थिति तब और बिगड़ गई जब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ईरान पर इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से गुजर रहे अपने दो जहाजों पर हमला करने का आरोप लगाया। अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी ने जानकारी दी कि गुरुवार शाम को उसके दो जहाजों को निशाना बनाया गया। यूएई सरकार ने इस हमले के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है, हालांकि ईरान की ओर से इन विशिष्ट आरोपों पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
होर्मुज को अमेरिकी क्षेत्र घोषित करने की ट्रंप की चेतावनी
अंतरराष्ट्रीय तनाव को और बढ़ाते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को एक बड़ा बयान दिया। ट्रंप ने कहा कि ईरान को हराने के बाद वे जल्द ही होर्मुज जलडमरूमध्य को अमेरिका का क्षेत्र घोषित कर देंगे। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल और एलएनजी की एक बहुत बड़ी मात्रा गुजरती है। ट्रंप के इस बयान ने ईरान के साथ जारी संघर्ष को एक नए और अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है, जिससे क्षेत्र में अमेरिका के रणनीतिक इरादों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
नौसैनिक नाकेबंदी और नए आर्थिक प्रतिबंध
अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस क्षेत्र में अपनी सैन्य पकड़ ढीली नहीं करेगा और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि अमेरिकी सेना ईरान पर नौसैनिक नाकेबंदी को अनिश्चित काल तक जारी रखने में पूरी तरह सक्षम है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी नौसेना अपने जहाजों को बदल-बदल कर इस नाकेबंदी को हमेशा के लिए कायम रख सकती है। इसी बीच, ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि अगले हफ्ते ऐसे कड़े आर्थिक कदमों का ऐलान किया जाएगा जो अब तक किसी भी देश को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के लिए नहीं उठाए गए हैं।
जहाजों की आवाजाही में रिकॉर्ड गिरावट
शिप ट्रैकिंग कंपनी क्प्लर के आंकड़ों के अनुसार, होर्मुज जलमार्ग पर जहाजों की संख्या में भारी कमी आई है और शुक्रवार को इस रास्ते से केवल 2 जहाज गुजरे, जिनमें से एक अनाज ले जा रहा जहाज ईरानी जलक्षेत्र में गया और एक खाली जहाज दूसरी दिशा में निकला। इसके अलावा एक खाली तेल टैंकर भी खाड़ी की ओर जाता देखा गया। विशेष रूप से, शुक्रवार को किसी भी कच्चे तेल के जहाज की आवाजाही दर्ज नहीं की गई। यह संख्या गुरुवार के 9 जहाजों और बुधवार के 5 जहाजों के मुकाबले बहुत कम है। अगस्त महीने का औसत 12 जहाज प्रतिदिन रहा है, लेकिन यह उस समय के मुकाबले नगण्य है जब फरवरी में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर युद्ध शुरू करने से पहले रोजाना 130 से ज्यादा जहाज यहां से गुजरते थे। विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ जहाज अपने ट्रांसपोंडर बंद करके भी निकल सकते हैं, जिससे वास्तविक आंकड़े थोड़े भिन्न हो सकते हैं।
ईरान की जवाबी कार्रवाई और शर्तें
अमेरिकी दबाव के जवाब में ईरानी संसद की एक समिति ने एक ऐसी योजना को मंजूरी दी है जिसके तहत अमेरिका, इजरायल और अन्य दुश्मन देशों के जहाजों और उपकरणों को इस जलमार्ग से गुजरने से रोका जाएगा। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि जब तक उनकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, यह रास्ता पूरी तरह नहीं खुलेगा। ईरान की मुख्य मांगों में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना और उसकी जब्त की गई संपत्ति को वापस करना शामिल है और जून में हुआ युद्धविराम टूटने के बाद से ईरान उन जहाजों को निशाना बना रहा है जो उसकी अनुमति के बिना इस रास्ते का उपयोग करने की कोशिश करते हैं। अमेरिका ने जून के मध्य में एक महीने के लिए नाकेबंदी हटाई थी, लेकिन बाद में इसे फिर से लागू कर दिया, जिससे ईरान की विदेशी मुद्रा आय का मुख्य स्रोत बंद हो गया है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत पर प्रभाव
इस संकट का असर वैश्विक तेल कीमतों और विभिन्न देशों की ऊर्जा नीतियों पर भी दिख रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 87 डॉलर और अमेरिकी क्रूड की कीमतें 81 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं। भारत के संदर्भ में, रूसी कच्चे तेल पर उसकी निर्भरता जुलाई में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। वहीं, एशियाई रिफाइनरियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इस हफ्ते अमेरिकी क्रूड की खरीदारी की है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर घरेलू स्तर पर भी दबाव है क्योंकि पेट्रोल की ऊंची कीमतें उनकी लोकप्रियता को प्रभावित कर रही हैं, जिससे नवंबर के मिडटर्म चुनावों में उनकी पार्टी की स्थिति कमजोर हो सकती है। इसके अलावा, यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरामको की रिफाइनरी पर ड्रोन हमले ने व्यापक क्षेत्रीय युद्ध की आशंका को और बढ़ा दिया है। अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह तनाव जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो दुनिया मंदी की चपेट में आ सकती है।