मध्य पूर्व के समुद्री क्षेत्र में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका अपने नौसैनिक बेड़े में एक महत्वपूर्ण बदलाव की तैयारी कर रहा है। लगभग 9 महीने तक अरब सागर में गश्त करने और बारूदी चुनौतियों का सामना करने के बाद, USS अब्राहम लिंकन अब वापस लौटने वाला है। इस विशाल एयरक्राफ्ट कैरियर की वापसी केवल एक जहाज का लौटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका की नाकाबंदी की रणनीति अब खुद वाशिंगटन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात को समझते हैं कि लंबे समय तक ईरान की नाकाबंदी अकेले अमेरिका के बस की बात नहीं है, इसीलिए अरब देशों के साथ मिलकर एक नया साझा प्रोग्राम तैयार किया जा रहा है।
USS अब्राहम लिंकन पर उपजा संकट
USS अब्राहम लिंकन पिछले 260 दिन से समुद्र में तैनात था। इस लंबी तैनाती के दौरान एक गंभीर स्थिति यह रही कि जहाज को लगभग 200 दिन से कोई पोर्ट कॉल नहीं दी गई थी। सामान्य नियमों के अनुसार, किसी भी एयरक्राफ्ट कैरियर को हर 30 से 45 दिन के भीतर किसी बंदरगाह पर रुकना जरूरी होता है। 200 दिन तक समुद्र में रहने के कारण जहाज पर रसद और प्रबंधन की समस्याएं खड़ी हो गईं। खबरों के मुताबिक, कैरियर पर खाने की कमी हो गई थी और टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाओं में भी दिक्कतें आने लगी थीं। इस स्थिति ने नौसैनिकों और उनके परिवारों को मानसिक रूप से प्रभावित किया। दावा किया गया कि 6 सैनिकों ने समुद्र में कूदकर जान देने की कोशिश की, हालांकि CENTCOM ने इन दावों का खंडन किया है। उनका कहना है कि 3 अगस्त को एक नौसैनिक गलती से गिर गया था जिसे बचा लिया गया। लेकिन जिस तरह से USS जॉर्ज वाशिंगटन को जल्दबाजी में भेजा गया है, वह इन दावों की गंभीरता की ओर इशारा करता है।
USS जॉर्ज वाशिंगटन की नई तैनाती
USS अब्राहम लिंकन की जगह लेने के लिए USS जॉर्ज वाशिंगटन मलक्का स्ट्रेट से रवाना हो चुका है। इसके साथ 2 डिस्ट्रॉयर भी चल रहे हैं। यह बेड़ा अंडमान सागर से होते हुए अरब सागर में पहुंचेगा और ओमान की खाड़ी के पास तैनात होगा। मलक्का स्ट्रेट से इसकी दूरी 6150 से 6650 किमी के बीच है और इसे पहुंचने में 7 से 8 दिन लग सकते हैं। यह भी निमित्ज क्लास का कैरियर है और इस पर 90 फाइटर जेट तैनात किए जा सकते हैं। जैसे ही यह अरब सागर पहुंचेगा, USS लिंकन अपने होम पोर्ट सैन डिएगो के लिए रवाना हो जाएगा।
तकनीक और रणनीति में बदलाव
डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा फैसला लेते हुए आधुनिक फोर्ड क्लास एयरक्राफ्ट कैरियर्स से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम यानी EMALS को हटाने का निर्देश दिया है। इसकी जगह पुरानी स्टीम कैटापुल्ट तकनीक का उपयोग किया जाएगा। ट्रंप का मानना है कि नई तकनीक बहुत जटिल और महंगी है, जबकि पुरानी भाप प्रणाली अधिक भरोसेमंद है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब चीन और फ्रांस जैसी शक्तियां EMALS तकनीक को अपना रही हैं। इसके अलावा, अमेरिका ने टास्क फोर्स फाल्कन स्ट्राइक नाम से एक ड्रोन टास्क फोर्स बनाने का ऐलान किया है। इसमें सऊदी अरब, UAE, बहरीन, कतर, कुवैत और जॉर्डन जैसे देश शामिल होंगे। इस टास्क फोर्स में सुसाइड ड्रोन, नेवल ड्रोन और अंडरवॉटर ड्रोन शामिल किए जाएंगे। अमेरिका ने अब तक ईरान के साथ संघर्ष में 45 MQ-9 रीपर ड्रोन खो दिए हैं, जो उसके कुल बेड़े का 25 प्रतिशत है।
जंग या नाकाबंदी: अमेरिका के सामने दो रास्ते
ईरान के खिलाफ भविष्य की रणनीति को लेकर अमेरिका के भीतर दो अलग-अलग विचार उभर रहे हैं और जहां ट्रंप और उनके करीबी नाकाबंदी को जारी रखने के पक्ष में हैं, वहीं CENTCOM चीफ ब्रैड कूपर ने ईरान पर सीधे हमले की इच्छा जताई है। कूपर ने IDF चीफ इयाल जमीर के साथ बैठक में कहा कि जंग के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है और ट्रंप और ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ डैन केन को जमीनी हकीकत से अवगत करा दिया गया है। अब अमेरिका के सामने यह सवाल है कि वह महंगी पड़ती नाकाबंदी को जारी रखे या सीधे युद्ध के मैदान में उतरे।