भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति और आर्थिक समीकरणों को पूरी तरह से बदल दिया है। 27 जनवरी 2026 को हस्ताक्षरित इस समझौते को वैश्विक व्यापार जगत में 'मदर ऑफ ऑल डील्स' के रूप में देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच हुई इस संधि ने न केवल भारत के लिए यूरोप के दरवाजे खोल दिए हैं, बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट भी खड़ा कर दिया है। यह समझौता लगभग 2 अरब लोगों के विशाल बाजार को एक सूत्र में पिरोता है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है।
पाकिस्तान की चिंता का मुख्य कारण
पाकिस्तान के लिए यह समझौता किसी बड़े झटके से कम नहीं है और अब तक पाकिस्तान यूरोपीय संघ के 'जीएसपी प्लस' (GSP+) दर्जे का लाभ उठाकर अपने उत्पादों को कम शुल्क पर यूरोप भेजता था। लेकिन भारत के साथ इस नई डील के बाद, भारतीय उत्पादों को भी यूरोपीय बाजार में शून्य या बहुत कम शुल्क पर प्रवेश मिलेगा। भारत की विशाल उत्पादन क्षमता और बेहतर गुणवत्ता के सामने पाकिस्तान का टिकना मुश्किल नजर आ रहा है। पाकिस्तानी विदेश विभाग के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने हाल ही में एक प्रेस ब्रीफिंग में स्वीकार किया कि सरकार इस समझौते के प्रभावों का बारीकी से विश्लेषण कर रही है और यूरोपीय अधिकारियों के साथ संपर्क में है।
टेक्सटाइल सेक्टर पर मंडराता खतरा
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ उसका टेक्सटाइल यानी कपड़ा उद्योग है। पाकिस्तान के कुल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा यूरोपीय देशों को जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-EU डील के बाद भारतीय कपड़ा उद्योग को। जो बढ़त मिलेगी, उससे पाकिस्तान के ऑर्डर भारत की ओर शिफ्ट हो सकते हैं। भारत के पास वर्टिकल इंटीग्रेशन, आधुनिक तकनीक और बेहतर वैल्यू एडिशन की क्षमता है, जो पाकिस्तान के पास फिलहाल नहीं है और पाकिस्तानी निर्यातकों का कहना है कि अगर उनके ऑर्डर कम हुए, तो देश में हजारों कारखाने बंद हो सकते हैं और लाखों लोगों की नौकरियां जा सकती हैं।
शहबाज सरकार की कूटनीतिक भागदौड़
इस महाडील की खबर मिलते ही इस्लामाबाद में हलचल तेज हो गई है। शहबाज शरीफ सरकार ने अपने वाणिज्य मंत्रालय और विदेशी दूतावासों को सक्रिय कर दिया है। पाकिस्तान अब यूरोपीय संघ को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि वह उनके लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार बना रहे और हालांकि, आर्थिक जानकारों का कहना है कि भारत की आर्थिक शक्ति और बड़े बाजार के आकर्षण के सामने पाकिस्तान की दलीलें कमजोर पड़ सकती हैं। पाकिस्तान के थिंक टैंक्स ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि समय रहते वैकल्पिक बाजार नहीं खोजे गए या अपनी उत्पादन क्षमता नहीं सुधारी गई, तो यूरोपीय बाजार में उनकी हिस्सेदारी शून्य हो सकती है।
भारत की बढ़ती वैश्विक धमक
यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती वैश्विक साख का भी प्रतीक है। भारत अब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है और यूरोपीय संघ जैसे बड़े ब्लॉक के साथ ऐसा समझौता करना भारत की कूटनीतिक जीत है और इस डील से भारत के आईटी, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि और ऑटोमोबाइल सेक्टर को जबरदस्त उछाल मिलने की उम्मीद है। जहां भारत इस सफलता का जश्न मना रहा है, वहीं पाकिस्तान अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान इस आर्थिक चुनौती का सामना कैसे करता है।