भारत में तेल के दाम 7 महीने में 8 प्रतिशत बढ़े: अमेरिका और चीन से कम, जानें वजह

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भारत में तेल के दाम 7 महीने में 8 प्रतिशत बढ़े: अमेरिका और चीन से कम, जानें वजह
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ईरान युद्ध का असर दुनिया के पेट्रोल और डीजल बाजार पर साफ तौर पर दिखाई दे रहा है और कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण कई देशों में पेट्रोल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। हालांकि, इस वैश्विक संकट के बीच भारत में पेट्रोल के दामों में हुई बढ़ोतरी कई अन्य प्रमुख देशों की तुलना में काफी कम रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में पेट्रोल की कीमत में लगभग 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके विपरीत, चीन में 17 प्रतिशत, रूस में 13 प्रतिशत और अमेरिका में करीब 49 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब पूरी दुनिया में कच्चा तेल महंगा हो रहा है, तो भारत में इसका असर इतना सीमित क्यों रहा?

सरकारी नीति और टैक्स राहत का बड़ा योगदान

भारत में तेल की कीमतों के स्थिर रहने की सबसे बड़ी वजह सरकार की फ्यूल प्राइस पॉलिसी रही है। भारत में पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमत में कच्चे तेल की लागत के अलावा एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकारों का वैट और अन्य शुल्क शामिल होते हैं और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा हुआ, तो सरकार ने टैक्स के जरिए बढ़ते बोझ का एक हिस्सा खुद उठाने का फैसला किया। मार्च 2026 के दौरान कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर से बढ़कर लगभग 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। इस स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटा दी। इस कदम से सरकारी तेल कंपनियों की बढ़ी हुई लागत और अंडर-रिकवरी का भार कम हुआ और आम जनता पर कीमतों का सीधा बोझ नहीं पड़ा।

आपूर्ति के स्रोतों का विविधीकरण और रूसी तेल

भारत को दूसरा बड़ा फायदा अपने कच्चे तेल की आपूर्ति के स्रोतों को बदलने से मिला है। रूस पिछले कुछ समय से भारत के लिए एक प्रमुख तेल सप्लायर के रूप में उभरा है। ईरान युद्ध के बाद जब मध्य पूर्व से तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी, तब भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद में तेजी ला दी। जून और जुलाई के महीनों में भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी क्रूड खरीदा। जुलाई 2026 में रूस से भारत का क्रूड इंपोर्ट अपने रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया था। उस समय रूसी तेल पर मिलने वाले डिस्काउंट ने भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसे बेहद आकर्षक बना दिया। इसके अलावा, भारत ने यूएई और अमेरिका से भी तेल की खरीद शुरू की है और गैस के लिए अमेरिका पर निर्भरता बढ़ाई है, जिससे एलपीजी सप्लाई में रिकॉर्ड बूम देखा गया है।

मजबूत रिफाइनिंग क्षमता और डैमेज कंट्रोल

भारत की अपनी रिफाइनिंग क्षमता भी उसे वैश्विक संकटों से बचाने में मदद करती है। भारत केवल कच्चा तेल खरीदकर उसका सीधा उपयोग नहीं करता, बल्कि देश की बड़ी रिफाइनरियां इस क्रूड को पेट्रोल, डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं। इससे भारत के पास वैश्विक सप्लाई चेन में होने वाले बदलावों के बीच फ्यूल मैनेजमेंट की अतिरिक्त गुंजाइश रहती है। यही कारण है कि भारत अपनी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग देशों से क्रूड खरीद सकता है और घरेलू बाजार के लिए ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकता है। हालांकि, भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए लंबे समय तक कीमतों के ऊंचे रहने पर इंपोर्ट बिल और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, लेकिन मजबूत रिफाइनिंग क्षमता फिलहाल डैमेज कंट्रोल में सहायक सिद्ध हो रही है।

अमेरिका में 49 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी क्यों?

यह समझना भी जरूरी है कि जब भारत में तेल के दाम केवल 8 प्रतिशत बढ़े, तो अमेरिका में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत तक कैसे पहुंच गया। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल और गैसोलीन उत्पादक होने के बावजूद वहां की कीमतें सीधे तौर पर ग्लोबल क्रूड मार्केट से जुड़ी होती हैं। एक्सियोस (Axios) की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी संघीय सरकार ने खुदरा पेट्रोल कीमतों पर भारत जैसी कोई कीमत सीमा या सब्सिडी व्यवस्था लागू नहीं की है। इस वजह से कच्चे तेल और रिफाइंड फ्यूल की कीमतों में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी का सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है और इसके अलावा, रूस में यूक्रेन के ड्रोन हमलों से रिफाइनरियों को हुए नुकसान ने भी डीजल और अन्य मोटर फ्यूल की वैश्विक सप्लाई पर दबाव डाला है, जिसका असर वहां के बाजार में दिख रहा है।

भविष्य की चुनौतियां और वैश्विक दबाव

पाकिस्तान जैसे देश, जो अपनी ईंधन जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर हैं, वहां वैश्विक सप्लाई संकट का असर बहुत ज्यादा है। चीन में भी पेट्रोल की कीमतें भारत के मुकाबले अधिक बढ़ी हैं और एक्सियोस के मुताबिक, अलग-अलग देशों में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी एक समान नहीं है। भारत के लिए भी चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है और होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों से सप्लाई बाधित होती है, या फिर रूस से मिलने वाला डिस्काउंट कम होता है, तो भारत के लिए सस्ता क्रूड प्राप्त करना कठिन हो जाएगा। इससे भविष्य में पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और सरकारी बजट पर दबाव बढ़ सकता है। वर्तमान में सरकारी टैक्स राहत, रूसी तेल और रिफाइनिंग क्षमता ने भारत को बचाया है, लेकिन वैश्विक बाजार की अनिश्चितता बनी हुई है।

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