भारत भरोसेमंद साझेदार: पनडुब्बी डील और डिफेंस एक्सपोर्ट पर जर्मनी का बड़ा फैसला

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भारत भरोसेमंद साझेदार: पनडुब्बी डील और डिफेंस एक्सपोर्ट पर जर्मनी का बड़ा फैसला
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भारत और जर्मनी के बीच रक्षा और रणनीतिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाते हुए, भारत में जर्मनी के नए राजदूत डॉ. जैस्पर वीक ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत की ओर से आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद जर्मनी प्रस्तावित पनडुब्बी साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह कदम दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और सुरक्षा साझेदारी को दर्शाता है, जो पिछले कुछ वर्षों में तेजी से मजबूत हुई है। राजदूत ने कहा कि इस साझेदारी के सामने अब कोई बड़ी रुकावट नहीं है और दोनों देश रक्षा औद्योगिक सहयोग को नई दिशा देने के लिए तैयार हैं।

रक्षा निर्यात लाइसेंसिंग नीति में बड़ा बदलाव

राजदूत डॉ. वीक ने बताया कि जर्मनी ने भारत के प्रति अपनी रक्षा निर्यात लाइसेंसिंग नीति में व्यापक बदलाव किया है। भारत को एक अत्यंत विश्वसनीय साझेदार मानते हुए जर्मनी अब रक्षा निर्यात लाइसेंस जारी करने के मामले में अधिक उदार और सकारात्मक रुख अपना रहा है और इस नीतिगत बदलाव का उद्देश्य उन बाधाओं को कम करना है जो पहले रक्षा सौदों और तकनीक के हस्तांतरण में आड़े आती थीं। राजदूत के अनुसार, जर्मनी अब भारत के साथ रक्षा औद्योगिक सहयोग को लेकर अधिक सक्रिय है, जिससे भविष्य में हथियारों के निर्यात और तकनीकी सहयोग में तेजी आएगी।

सैन्य अभ्यास और परिचालन सहयोग

दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युद्धक्षेत्र के अभ्यासों में भी दिखाई दे रहा है और डॉ. वीक ने भारत में होने वाले तरंग शक्ति (Tarang Shakti) एयर एक्सरसाइज में जर्मनी की भागीदारी की पुष्टि की। इस अभ्यास में जर्मनी अपने A400M ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के साथ शामिल होगा। इससे पहले जर्मनी यूरोफाइटर (Eurofighter) विमानों के साथ भी भारतीय सैन्य अभ्यासों का हिस्सा रह चुका है।

समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में भी दोनों देशों का सहयोग बढ़ रहा है। इस साल की शुरुआत में जर्मनी ने मिलन (MILAN) नौसैनिक अभ्यास में अपने P-8 समुद्री गश्ती विमान के साथ हिस्सा लिया था। चूंकि भारतीय नौसेना भी P-8 विमानों का संचालन करती है, इसलिए दोनों सेनाओं के बीच अंतर-संचालनीयता (interoperability) बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। हिंद महासागर में समुद्री जागरूकता और सूचना साझा करने के लिए जर्मनी का एक संपर्क अधिकारी (liaison officer) पिछले 2 महीनों से दिल्ली स्थित इंडो-पैसिफिक इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर में तैनात है। यह अधिकारी समुद्री सुरक्षा और व्यापारिक शिपिंग की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप और तकनीक हस्तांतरण

भारत और जर्मनी ने अप्रैल 2026 में रक्षा मंत्रियों की उपस्थिति में एक डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप पर हस्ताक्षर किए थे। राजदूत ने जानकारी दी कि पनडुब्बी सौदे का मसौदा लगभग पूरा हो चुका है और अब केवल औपचारिक हस्ताक्षर होना बाकी है। इस सहयोग का एक मुख्य स्तंभ तकनीक का हस्तांतरण है और भारत अपनी रक्षा क्षमताओं में स्वदेशी उत्पादन और विकास को बढ़ावा देना चाहता है, और जर्मनी इस लक्ष्य को प्राप्त करने में भारत का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है। दोनों देश अपनी सुरक्षा, शांति और राष्ट्रीय विकास के लिए रक्षा क्षेत्र में बड़े निवेश कर रहे हैं।

क्षेत्रीय चुनाव और राजनीतिक स्थिरता

जर्मनी के कुछ राज्यों में दक्षिणपंथी पार्टी AfD की बढ़त को लेकर उठ रहे सवालों पर राजदूत ने स्पष्ट किया कि इसका भारत-जर्मनी संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सैक्सोनी-आनहॉल्ट, मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमर्न और बर्लिन जैसे राज्यों के चुनाव परिणाम क्षेत्रीय स्तर के हैं। विदेश नीति, सुरक्षा नीति और व्यापार जैसे विषय संघीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जिन पर क्षेत्रीय सरकारों का कोई नियंत्रण नहीं होता और उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि सैक्सोनी-आनहॉल्ट में लगभग 17 लाख और मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमर्न में लगभग 13 लाख पात्र मतदाता हैं, जो पूरे जर्मनी की राजनीतिक तस्वीर को नहीं बदलते। इसके अलावा, AfD के पास अकेले सरकार बनाने के लिए बहुमत नहीं है।

वैश्विक भू-राजनीति और रणनीतिक महत्व

भारत और जर्मनी के बीच रणनीतिक साझेदारी साल 2000 में शुरू हुई थी, लेकिन राजदूत के अनुसार, पिछले 26 वर्षों की तुलना में आज इसका महत्व कहीं अधिक बढ़ गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप में स्थिरता को प्रभावित किया है, जबकि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के आक्रामक रुख ने भारत के लिए नई चुनौतियां पेश की हैं। ऐसे समय में भारत और जर्मनी का एक-दूसरे पर भरोसा करना और स्थिर संबंध बनाए रखना वैश्विक शांति के लिए आवश्यक है। राजदूत ने यह भी उल्लेख किया कि अमेरिका जैसे पारंपरिक साझेदारों की बदलती नीतियों के बीच भारत-जर्मनी की साझेदारी अधिक पूर्वानुमेय और विश्वसनीय हो गई है।

आर्थिक भविष्य: FTA, ग्रीन एनर्जी और AI

राजदूत डॉ. वीक ने अपने कार्यकाल के लिए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते के लागू होने के बाद अगले पांच वर्षों में भारत और जर्मनी के बीच व्यापार दोगुना हो सकता है। राजदूत के भारत आने के मात्र छह सप्ताह के भीतर ही जर्मनी से दो बड़े व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भारत आ चुके हैं, जिनमें हेस्से के मुख्यमंत्री बोरिस राइन का प्रतिनिधिमंडल भी शामिल था।

इसके अलावा, दोनों देश नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और क्लीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ग्रीन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट पार्टनरशिप के तहत काम कर रहे हैं। फरवरी से दोनों देशों के बीच एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पैक्ट भी प्रभावी है। शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रगति देखी गई है, जहां जर्मनी में भारतीय छात्रों की संख्या 2020 के 20 हजार से बढ़कर अब लगभग 70 हजार हो गई है। यह कुशल श्रमिकों की आवाजाही और लोगों के बीच बढ़ते संपर्क का प्रमाण है।

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