Indus Waters Treaty

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Indus Waters Treaty
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सिंधु जल संधि को लेकर सीमा पार से बढ़ते शोर-शराबे के बीच भारत ने अपना रुख बेहद कड़ा कर लिया है। केंद्र सरकार के आला सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सिंधु जल संधि अपने मौजूदा स्वरूप में अब दोबारा लागू नहीं होगी। सूत्रों का स्पष्ट कहना है कि 1960 की सिंधु जल संधि प्रभावी रूप से समाप्त हो चुकी है। इस कड़े रुख के पीछे मुख्य कारण यह है कि यह संधि 1950 के दशक की परिस्थितियों और उस समय की तकनीक पर आधारित थी, जो आज के समय के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं है।

पुरानी तकनीक और बदलती परिस्थितियां

सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह संधि आपसी सद्भावना के आधार पर बनाई गई थी। उस समय आतंकवाद जैसी भयावह परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखा गया था, जो आज एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। भारत का मानना है कि जब सद्भावना ही समाप्त हो गई है, तो संधि के पुराने नियमों का पालन करना तर्कसंगत नहीं है। 1950 के दशक के तकनीकी मानक आज की जल प्रबंधन आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं, और इसी कारण भारत अब इस पर नए सिरे से विचार कर रहा है।

पाकिस्तान का कुप्रबंधन और अड़ंगेबाजी

सरकारी सूत्रों ने यह भी खुलासा किया कि पाकिस्तान ने पिछले छह दशकों में एक भी नया बड़ा बांध नहीं बनाया है। पाकिस्तान अपने हिस्से के मौजूदा जल संसाधनों का भी समुचित प्रबंधन करने में पूरी तरह विफल रहा है और आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान के हिस्से के बहाव वाले पानी का केवल 10 प्रतिशत ही संग्रहित किया जाता है, जबकि लगभग 50 प्रतिशत पानी बिना किसी उपयोग के अरब सागर में बह जाता है। इसके बावजूद, भारत की हर जल परियोजना पर पाकिस्तान की आपत्तियों का एकमात्र उद्देश्य उन्हें धीमा करना रहा है। कश्मीर के लिए अत्यंत लाभकारी साबित होने वाली तुलबुल परियोजना को भी पाकिस्तान की इन्हीं आपत्तियों के कारण स्थगित करना पड़ा था। अब भारत ने नई जल परियोजनाओं में तेजी लाने का फैसला किया है और इसके लिए विभिन्न स्थानों पर सर्वेक्षण का काम शुरू कर दिया गया है।

ऐतिहासिक फैसला: रक्त और पानी एक साथ नहीं बहेंगे

अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने कड़ा एक्शन लिया। भारत की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने 1960 की सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया। पाकिस्तान को सीधा संदेश दिया गया कि आतंकवाद और द्विपक्षीय संधियों का लाभ एक साथ नहीं चल सकता, यानी "रक्त और पानी एक साथ नहीं बहेंगे"। इस ऐतिहासिक फैसले के तहत भारत ने नदियों के पानी का डेटा शेयरिंग, सालाना बैठकें, परियोजनाओं का आपसी निरीक्षण और अंतरराष्ट्रीय अदालती कार्यवाहियों में हिस्सा लेना पूरी तरह बंद कर दिया है। साथ ही, जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रतले जैसे जल-विद्युत प्रोजेक्ट्स का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया गया है, जिन पर पाकिस्तान सालों से अड़ंगे लगा रहा था।

पाकिस्तान में खौफ और आर्थिक संकट

भारत के इस कड़े फैसले से पाकिस्तान में हड़कंप और खौफ का माहौल है। पाकिस्तान की लगभग 80 प्रतिशत खेती और पेयजल आपूर्ति भारत से होकर बहने वाली इन्हीं पश्चिमी नदियों पर निर्भर है। पहले से ही गंभीर आर्थिक कंगाली, भारी महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान को अब यह डर सता रहा है कि यदि भारत ने बांधों के निर्माण में तेजी लाई या पानी का बहाव नियंत्रित किया, तो वहां भुखमरी और सूखे के हालात पैदा हो जाएंगे। पाकिस्तान का भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरने का पैंतरा भी पूरी तरह विफल हो चुका है और भारत ने साफ कर दिया है कि जब तक सीमा पार से आतंकवाद पर पूरी तरह और स्थायी रूप से रोक नहीं लगती, तब तक यह संधि किसी भी कीमत पर बहाल नहीं होगी।

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