भारत आगामी 19 से 20 फरवरी 2026 तक नई दिल्ली में वैश्विक एआई-इंपैक्ट समिट का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए भारत के नेतृत्व की आधिकारिक तौर पर सराहना की है और गुटेरेस ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक 'पूर्णतः महत्वपूर्ण मुद्दा' करार दिया है और इसे वर्तमान समय की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक माना है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने पुष्टि की है कि वह इस शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए स्वयं भारत का दौरा करेंगे।
शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि और पीएम मोदी का विजन
इस वैश्विक एआई-इंपैक्ट समिट की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस में आयोजित एआई एक्शन समिट के दौरान की थी। यह आयोजन विशेष महत्व रखता है क्योंकि यह ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) में आयोजित होने वाली अपनी तरह की पहली वैश्विक एआई समिट होगी। भारत का उद्देश्य इस तकनीक को केवल आर्थिक लाभ तक सीमित न रखकर इसे मानवता और पर्यावरण की भलाई के लिए एक उपकरण के रूप में स्थापित करना है। यह सम्मेलन पूरी तरह से 'पीपल, प्लैनेट एंड प्रोग्रेस' (लोग, ग्रह और प्रगति) के मूल सिद्धांतों पर केंद्रित होगा।
पीपल, प्लैनेट एंड प्रोग्रेस: समिट के मुख्य स्तंभ
इंडिया-एआई इंपैक्ट समिट 2026 का प्राथमिक लक्ष्य एक ऐसे भविष्य का निर्माण करना है जहां एआई तकनीक समावेशी विकास को बढ़ावा दे। 'पीपल' स्तंभ के तहत, ध्यान इस बात पर होगा कि कैसे एआई स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और कृषि में आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बना सकता है और 'प्लैनेट' स्तंभ के अंतर्गत, जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए एआई के उपयोग पर चर्चा की जाएगी। अंत में, 'प्रोग्रेस' का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी प्रगति का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे, जिससे डिजिटल विभाजन को कम किया जा सके।
ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने स्पष्ट किया कि समिट में उनका संदेश 'ग्लोबल डिजिटल कॉम्पैक्ट' के निष्कर्षों पर आधारित होगा। 2024 के फ्यूचर समिट में अपनाए गए इस कॉम्पैक्ट का उद्देश्य एक सुरक्षित और समावेशी डिजिटल भविष्य सुनिश्चित करना है। इसके तहत एआई पर एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पैनल बनाने की प्रतिबद्धता जताई गई है। यह पैनल वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय विचार-विमर्श को दिशा देगा। विशेष रूप से, गुटेरेस ने इस पैनल के लिए दुनिया भर से 40 विशेषज्ञों की सिफारिश की है, जिनमें आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर बलरामन रविंद्रन भी शामिल हैं।
विकासशील देशों के लिए क्षमता निर्माण का महत्व
गुटेरेस के अनुसार, भारत जैसे देशों में एआई के क्षेत्र में पहले से ही उल्लेखनीय क्षमता मौजूद है। समिट का एक केंद्रीय लक्ष्य यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय विकासशील देशों में तकनीकी क्षमता निर्माण के लिए कैसे बेहतर तरीके से एकजुट हो सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, एआई के क्षेत्र में ज्ञान के अंतर को कम करना और अर्थव्यवस्थाओं पर इसके वास्तविक प्रभावों का सटीक आकलन करना इस वैज्ञानिक निकाय की प्राथमिकता होगी। यह पहल उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए बहुपक्षीय समाधान खोजने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण और भविष्य की राह
राजनयिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत द्वारा इस समिट की मेजबानी करना वैश्विक डिजिटल गवर्नेंस में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। एआई के नैतिक उपयोग और इसके नियमन पर वैश्विक सहमति बनाना एक जटिल कार्य है, जिसमें भारत एक सेतु की भूमिका निभा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि चर्चाएं केवल तकनीकी न होकर सामाजिक और मानवीय पहलुओं को भी समान महत्व दें। आगामी समिट से यह उम्मीद की जा रही है कि यह एआई के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग के लिए एक नया वैश्विक ढांचा तैयार करने में सहायक सिद्ध होगा।