भारतीय वायुसेना की युद्धक क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए भारत सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए औपचारिक रूप से लेटर ऑफ रिक्वेस्ट यानी एलओआर जारी कर दिया है। यह विशाल रक्षा सौदा लगभग 3 लाख 25 हजार करोड़ रुपये का होने का अनुमान है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह 1 जून से फ्रांस की आधिकारिक यात्रा पर हैं। उनकी यह यात्रा भारत और फ्रांस के बीच रक्षा संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करने और इस मेगा डील की बारीकियों को अंतिम रूप देने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को बड़ा प्रोत्साहन
इस प्रस्तावित रक्षा सौदे की सबसे महत्वपूर्ण शर्त इसका निर्माण मॉडल है। समझौते के अनुसार, कुल 114 राफेल विमानों में से 94 विमानों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। यह पहल केंद्र सरकार के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को एक जबरदस्त बूस्ट प्रदान करेगी। हालांकि शुरुआती कुछ विमान सीधे फ्रांस से आएंगे ताकि वायुसेना की तत्काल जरूरतों को पूरा किया जा सके, लेकिन विमानों का बड़ा हिस्सा भारतीय धरती पर ही तैयार होगा। इस परियोजना के तहत 55 से 60 प्रतिशत तक स्थानीयकरण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे भारतीय रक्षा उद्योगों को वैश्विक स्तर की तकनीक और विनिर्माण क्षमता हासिल होगी।
विमानों की विशेषताएं और तकनीकी आवश्यकताएं
114 विमानों के इस बेड़े में 88 सिंगल-सीटर विमान और 26 ट्विन-सीटर ट्रेनर विमान शामिल होंगे। इन विमानों को आधुनिक युद्धक्षेत्र की जरूरतों के अनुसार एईएसए रडार, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और लंबी दूरी की मिसाइल क्षमताओं से लैस किया जाएगा। भारत ने इस सौदे में कुछ प्रमुख शर्तें भी रखी हैं, जिनमें स्वदेशी हथियारों का एकीकरण, भारतीय डेटा लिंक का उपयोग और इंजन, एयरफ्रेम तथा एवियोनिक्स के क्षेत्र में व्यापक टेक्नोलॉजी ट्रांसफर यानी तकनीक का हस्तांतरण शामिल है। इससे न केवल वर्तमान बेड़े को मजबूती मिलेगी, बल्कि भविष्य के स्वदेशी विमान कार्यक्रमों को भी तकनीकी सहायता प्राप्त होगी।
रणनीतिक यात्रा और भविष्य का रक्षा रोडमैप
अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान वायुसेना प्रमुख एपी सिंह राफेल बनाने वाली कंपनी दसॉल्ट एविएशन के प्रतिष्ठानों का दौरा करेंगे। इसके साथ ही वे एमबीडीए की सुविधाओं का भी निरीक्षण करेंगे, जिसकी मिसाइलें पहले से ही भारतीय वायुसेना के विभिन्न विमानों में उपयोग की जा रही हैं। इस यात्रा के दौरान केवल राफेल खरीद ही नहीं, बल्कि भविष्य के रक्षा सहयोग, स्वदेशी एएमसीए कार्यक्रम के लिए इंजन तकनीक और भारत में एयरोस्पेस निर्माण इकोसिस्टम को मजबूत करने पर भी चर्चा होने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 में रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने इस परियोजना को आवश्यकता की स्वीकृति प्रदान की थी, जो इसे भारत के इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाकू विमान खरीद परियोजनाओं में से एक बनाती है।