पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों में उत्पन्न बाधाओं के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से कच्चे तेल के आयात में भारी बढ़ोतरी की है। 9 मिलियन बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। 1% थी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88% आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार का व्यवधान घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, रूसी तेल की बढ़ती आवक ने देश में ईंधन की उपलब्धता को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान और खाड़ी देशों से घटती सप्लाई
ईरान और ओमान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग माना जाता है, जहां से दुनिया के कुल तेल का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। मार्च की शुरुआत से इस क्षेत्र में सुरक्षा चिंताओं के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, इस व्यवधान का सीधा असर खाड़ी देशों से भारत आने वाले तेल पर पड़ा है। 8% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इसके अतिरिक्त, सऊदी अरब और कुवैत जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से भी भारत को मिलने वाले तेल की मात्रा में लगभग 50% की कमी आई है।
रूस बना भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा भागीदार
खाड़ी देशों से आपूर्ति में आई कमी को पूरा करने के लिए भारतीय रिफाइनरियों ने तेजी से रूसी बाजार की ओर रुख किया है। 1 से 25 मार्च के बीच रूस से तेल की खेप में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई। विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने अपनी परिचालन क्षमता को बनाए रखने के लिए पहले ही अप्रैल तक की डिलीवरी के लिए लगभग 60 मिलियन बैरल रूसी कच्चे तेल का ऑर्डर दे दिया है। यह रणनीति न केवल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई है, बल्कि इससे वैश्विक बाजार में कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से भी देश को सुरक्षा मिली है। वर्तमान में रूस भारत का सबसे बड़ा एकल तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है।
भारतीय रिफाइनरियों की अग्रिम रणनीति और सुरक्षित भंडार
ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है। रिफाइनरियों ने अपने कमर्शियल सुरक्षित भंडार (Commercial Reserves) का कुशलतापूर्वक प्रबंधन किया है। आंकड़ों के अनुसार, संघर्ष शुरू होने से पहले के स्तर (जनवरी-फरवरी) की तुलना में भारत के कुल आयात में लगभग 8 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आई है, लेकिन घरेलू भंडार के उपयोग और रूस से बढ़ी हुई आपूर्ति ने इस कमी को महसूस नहीं होने दिया है। रिफाइनिंग प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के जारी है, जिससे देश भर में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।
कूटनीतिक मोर्चे पर भारत को मिली विशेष छूट
इस संकट के दौरान भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और ऊर्जा कूटनीति का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से देखा गया है और पूर्व में अमेरिका द्वारा रूसी तेल खरीद पर लगाए गए प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद, वर्तमान परिस्थितियों ने वाशिंगटन को अपनी स्थिति बदलने पर मजबूर किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में उछाल आने के डर से, अमेरिकी प्रशासन ने भारत को रूसी तेल की खरीद जारी रखने के लिए विशेष छूट (Waiver) प्रदान की है। विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका में आगामी चुनावों को देखते हुए ट्रंप प्रशासन वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखना चाहता है, जिसके लिए भारत जैसे बड़े उपभोक्ता का रूसी बाजार से जुड़े रहना आवश्यक हो गया है।
घरेलू बाजार पर प्रभाव और आपूर्ति की स्थिति
ईरान-इजरायल संघर्ष के बावजूद भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों पर तत्काल कोई बड़ा संकट नहीं है और केप्लर के विश्लेषण के अनुसार, भारत का तेल आयात तंत्र वर्तमान में बेहद लचीला है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता देखी जा रही है, लेकिन भारत द्वारा रूस से किए गए दीर्घकालिक समझौतों और अग्रिम खरीद ने एक सुरक्षा कवच प्रदान किया है। अधिकारियों के अनुसार, देश में ईंधन की आपूर्ति के लिए कोई तत्काल जोखिम नहीं है और रिफाइनरियां अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य कर रही हैं, जिससे घरेलू मांग को सुचारू रूप से पूरा किया जा रहा है।