दक्षिण-पश्चिम मानसून ने अब एक ऐसा विशाल रूप धारण कर लिया है जिसने पूरी दुनिया के मौसम वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। ताजा सैटेलाइट तस्वीरों में एक बेहद डरावना और विस्मयकारी दृश्य सामने आया है जिसमें करीब 7000 से 10000 किलोमीटर लंबी बादलों और बारिश की एक विशाल पट्टी दिखाई दे रही है। बादलों की यह विशाल पट्टी उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से शुरू होकर हिमालय की चोटियों को पार करते हुए चीन और फिर दक्षिण कोरिया तक फैली हुई है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यह इस साल के मानसून का सबसे सक्रिय और शक्तिशाली दौर है। इसके प्रभाव से आने वाले दिनों में उत्तर और मध्य भारत के एक बहुत बड़े हिस्से में भारी बारिश होने की प्रबल संभावना बनी हुई है।
क्या है मानसून कन्वर्जेंस ज़ोन और यह कैसे बना
मौसम वैज्ञानिकों के विश्लेषण के अनुसार यह एक विशाल मानसून कन्वर्जेंस ज़ोन है। इसका निर्माण उस समय हुआ जब हिंद महासागर की ओर से आने वाली नमी से लदी मानसूनी हवाएं एशिया के विभिन्न हिस्सों में मौजूद अन्य मौसम तंत्रों से टकराईं। इस आपसी टकराव और मिलन की प्रक्रिया ने हजारों किलोमीटर लंबा बादलों का एक ऐसा गलियारा तैयार कर दिया है जहां लगातार नए वर्षा वाले बादल बन रहे हैं और आगे की ओर बढ़ रहे हैं। यही मुख्य कारण है कि एक ही समय में भारत सहित कई एशियाई देशों में मानसूनी गतिविधियां इतनी तेज होती दिखाई दे रही हैं।
भारत में मानसून ने तोड़े रिकॉर्ड
पिछले दो दिनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में हुई बारिश सामान्य दैनिक औसत की तुलना में करीब 170 से 180 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई है। इसे इस मानसून सीजन का अब तक का सबसे मजबूत और व्यापक दौर माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में पहले ही जोरदार बारिश हो चुकी है। इसके साथ ही बंगाल की खाड़ी में बने कम दबाव के क्षेत्र ने पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भी बारिश की रफ्तार को काफी तेज कर दिया है जिससे पूरे देश में मानसून का असर दिख रहा है।
खेती और जलाशयों के लिए वरदान
मानसून की शुरुआत इस बार देश के कई हिस्सों में काफी असमान रही थी जिसके कारण कुछ राज्यों में बारिश की भारी कमी देखी जा रही थी। हालांकि वर्तमान में सक्रिय हुए इस दौर से उस कमी के काफी हद तक पूरा होने की उम्मीद है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तर और मध्य भारत में हो रही इस अच्छी बारिश से जलाशयों और बांधों का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा। यह स्थिति खरीफ की फसलों के लिए भी बहुत फायदेमंद साबित होगी क्योंकि उन्हें अब पर्याप्त नमी मिल सकेगी। इससे कृषि क्षेत्र और किसानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
भारी बारिश के साथ बढ़ा खतरों का सिलसिला
लगातार हो रही यह बारिश जहां एक तरफ राहत लेकर आई है वहीं दूसरी तरफ इसने खतरों को भी बढ़ा दिया है। मौसम विभाग और स्थानीय प्रशासन उन संवेदनशील इलाकों पर पैनी नजर रख रहे हैं जहां भारी बारिश के कारण अचानक बाढ़ आने, शहरों में जलभराव होने और भूस्खलन की घटनाएं हो सकती हैं। नदियों के जलस्तर में हो रही तेजी से बढ़ोतरी ने भी चिंता बढ़ा दी है। विशेष रूप से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में प्रशासन ने अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।
एशियाई मौसम चक्र का हिस्सा है भारतीय मानसून
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ताजा सैटेलाइट तस्वीरें इस बात की पुष्टि करती हैं कि भारतीय मानसून का प्रभाव केवल भारत की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है। मौजूदा मौसम प्रणाली अरब सागर से शुरू होकर पूर्वी एशिया के देशों तक फैली हुई है और एक साथ कई देशों के मौसम को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है। इसका अर्थ यह है कि भारत में हो रही यह बारिश एक बहुत बड़े एशियाई मौसम चक्र का हिस्सा है जो हजारों किलोमीटर तक फैले वायुमंडलीय तंत्र के माध्यम से संचालित हो रहा है और कई देशों में एक साथ वर्षा की गतिविधियों को नियंत्रित कर रहा है।