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रुपए के सामने डॉलर हुआ नतमस्तक, बीते कई सालों में नहीं दिखी ऐसी ताकत!

रुपए के सामने डॉलर हुआ नतमस्तक, बीते कई सालों में नहीं दिखी ऐसी ताकत!
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भारतीय मुद्रा बाजार में इस सप्ताह एक ऐतिहासिक मोड़ देखा गया जब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये ने पिछले तीन वर्षों की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त दर्ज की और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते (Trade Deal) के बाद रुपये में जबरदस्त मजबूती आई है। 4% की छलांग लगाई, जो जनवरी 2023 के बाद से इसका सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। हालांकि, सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को बाजार में कुछ मुनाफावसूली देखी गई, जिससे रुपये में मामूली गिरावट आई, लेकिन समग्र रूप से यह सप्ताह भारतीय मुद्रा के लिए अत्यंत सकारात्मक रहा।

शुक्रवार का बाजार उतार-चढ़ाव और मुनाफावसूली

6550 के स्तर पर बंद हुआ। 3% की गिरावट दर्ज की गई। बाजार विश्लेषकों के अनुसार, यह गिरावट किसी आर्थिक कमजोरी के कारण नहीं बल्कि व्यापारियों द्वारा की गई मुनाफावसूली का परिणाम थी और सप्ताह भर की बड़ी बढ़त के बाद कई निवेशकों ने अपने 'लॉन्ग पोजीशन' से लाभ कमाना उचित समझा। इसके अतिरिक्त, कुछ तकनीकी स्तरों पर 'स्टॉप-लॉस' ट्रिगर होने के कारण बिकवाली का दबाव बढ़ गया, जिससे रुपये की विनिमय दर में अस्थायी नरमी आई और हालांकि, मंगलवार को घोषित व्यापार समझौते के प्रभाव ने इस गिरावट को सीमित रखा।

आरबीआई की मौद्रिक नीति और रेपो रेट की स्थिरता

रुपये की मजबूती को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया फैसलों से भी समर्थन मिला है। केंद्रीय बैंक ने अपनी नवीनतम मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को यथावत रखने का निर्णय लिया है। आरबीआई ने अपना रुख 'न्यूट्रल' बनाए रखा है, जो यह दर्शाता है कि बैंक फिलहाल ब्याज दरों में वृद्धि के पक्ष में नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और यूरोप के साथ बेहतर होते व्यापारिक संबंधों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबाव को कम किया है। बार्कलेज के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, आरबीआई का यह निर्णय घरेलू मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच एक संतुलन बनाने का प्रयास है, जिससे रुपये को स्थिरता मिली है।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) का बदलता प्रवाह

विदेशी निवेशकों के रुख में आया बदलाव रुपये की मजबूती का एक प्रमुख कारक बनकर उभरा है। आंकड़ों के अनुसार, जनवरी महीने में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय बाजारों से लगभग $4 billion की निकासी की थी, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ गया था। हालांकि, फरवरी महीने में यह स्थिति बदलती नजर आ रही है। इस महीने अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में करीब $1 billion का निवेश किया है। व्यापार समझौते के बाद वैश्विक निवेशकों के बीच भारतीय बाजार के प्रति विश्वास बढ़ा है, जिसका सीधा सकारात्मक असर मुद्रा की विनिमय दर पर दिखाई दे रहा है।

विश्लेषकों का दृष्टिकोण और वैश्विक कारक

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की भविष्य की चाल काफी हद तक वैश्विक डॉलर इंडेक्स और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी और 8 के स्तर पर आ गया है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं को राहत मिली है। विश्लेषकों का कहना है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता केवल एक द्विपक्षीय डील नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को और मजबूत करता है। हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि रुपये की यह तेजी तभी स्थायी रह सकती है जब विदेशी निवेश का प्रवाह निरंतर बना रहे और वैश्विक भू-राजनीतिक स्थितियां स्थिर रहें।

निष्कर्ष के तौर पर, यह सप्ताह भारतीय रुपये के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है। व्यापार समझौते ने न केवल मुद्रा को मजबूती दी है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति वैश्विक धारणा को भी सकारात्मक बनाया है। आने वाले समय में बाजार की नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसलों और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर टिकी रहेंगी, जो रुपये की अगली दिशा तय करेंगे।

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