भारतीय शेयर बाजार इस समय एक अत्यंत दिलचस्प और महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है जो निवेशकों और विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। एक तरफ जहां विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ घरेलू संस्थागत निवेशकों ने मोर्चे पर डटकर बाजार को किसी भी बड़ी गिरावट का शिकार होने से बचा लिया है और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की मई महीने की मार्केट पल्स रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की हिस्सेदारी गिरकर अब 17 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई है। हालांकि, आम निवेशकों के लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इस भारी बिकवाली के बावजूद बाजार में किसी भी प्रकार की घबराहट या पैनिक की स्थिति नहीं देखी जा रही है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक संकेत छिपा हुआ है, जो बिल्कुल साल 2003 जैसी बाजार की तस्वीर पेश कर रहा है।
17 साल के निचले स्तर पर पहुंची विदेशी हिस्सेदारी
पिछले पूरे वित्त वर्ष (FY26) के दौरान विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालने की ओर बना रहा। अगर हम आंकड़ों पर विस्तार से नजर डालें तो FPIs ने वित्त वर्ष 2026 में करीब 19 अरब डॉलर के शेयर बेचे हैं। इस बिकवाली का सबसे ज्यादा असर वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में देखने को मिला, जब कुल बिकवाली का 72 प्रतिशत हिस्सा बाजार से बाहर निकाला गया। इस जबरदस्त छंटनी के बाद अब NSE में लिस्टेड कंपनियों के भीतर FPI की हिस्सेदारी सिमटकर केवल 15 पॉइंट 8 प्रतिशत रह गई है। बाजार के जानकारों का मानना है कि इसके पीछे मुख्य रूप से वैश्विक कारण हावी रहे हैं। विदेशी निवेशकों को भारत के मुकाबले दक्षिण कोरिया, ताइवान, जापान और हांगकांग जैसे अन्य एशियाई बाजार ज्यादा सस्ते और आकर्षक लग रहे हैं। इसके साथ ही, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की यील्ड बढ़ने के कारण भी निवेशकों ने जोखिम भरे इक्विटी बाजार से पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट किया है। एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इतनी भारी बिकवाली के बावजूद, साल 2020 से अब तक FPI के कुल निवेश की वैल्यू में 18 प्रतिशत से ज्यादा की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ (CAGR) दर्ज की गई है।
भारी बिकवाली के बीच घरेलू निवेशकों ने दिखाया दम
अब बाजार में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब विदेशी निवेशक इतना पैसा निकाल रहे हैं, तो बाजार में कोई बड़ा क्रैश क्यों नहीं आया? इसका सीधा जवाब हमारे घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) हैं और रिपोर्ट के आंकड़े काफी चौंकाने वाले और उत्साहजनक हैं। जहां एक तरफ FPIs ने वित्त वर्ष 2026 में 19 अरब 70 करोड़ डॉलर के शेयर बेचे, वहीं घरेलू निवेशकों ने बाजार में 95 अरब 80 करोड़ डॉलर की भारी-भरकम खरीदारी की है। यह खरीदारी विदेशी बिकवाली के मुकाबले करीब पांच गुना ज्यादा रही है। इसी मजबूत घरेलू नकदी ने शेयर बाजार को किसी भी बड़ी गिरावट से सुरक्षित रखा है। आज हालात ये हैं कि वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही तक कंपनियों में घरेलू निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़कर 19 पॉइंट 6 प्रतिशत हो गई है।
दिग्गज शेयरों से दूरी और सेक्टोरल बदलाव
विदेशी निवेशकों की रणनीति में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। FPIs अब हाई लिक्विडिटी वाले उन निफ्टी 50 शेयरों से दूरी बना रहे हैं, जिनमें पहले से काफी भीड़भाड़ है। ऐस इक्विटी (Ace Equity) के डाटा के मुताबिक, 25 मार्च 2026 तक लगातार चार तिमाहियों से विदेशी निवेशक निफ्टी की महज कुछ चुनिंदा कंपनियों में ही अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं, जबकि 10 प्रमुख कंपनियों से उन्होंने लगातार पैसा निकाला है। सेक्टर्स की बात करें तो इंडस्ट्रियल सेक्टर में बिकवाली सबसे ज्यादा हुई है, जबकि कंज्यूमर स्टेपल्स और आईटी में बिकवाली का दबाव थोड़ा कम रहा है। फाइनेंशियल सेक्टर पर उनका भरोसा अब भी कायम है और कम्युनिकेशन सेक्टर में लगातार 17वीं तिमाही तक उनकी ओवरवेट पोजीशन बनी हुई है।
साल 2003 जैसा ऐतिहासिक संकेत
घरेलू निवेशकों का बढ़ता दबदबा एक बड़े ऐतिहासिक ट्रेंड की तरफ इशारा कर रहा है। यह लगातार छठी तिमाही है जब बाजार में घरेलू निवेशकों की हिस्सेदारी विदेशी निवेशकों से ज्यादा दर्ज की गई है और भारतीय बाजार के इतिहास में ऐसा पिछली बार साल 2003 में हुआ था। उस वक्त जब विदेशी निवेशकों ने बाजार में दोबारा वापसी की थी, तो अगले 12 महीनों के भीतर मार्केट में 70 प्रतिशत की तूफानी तेजी दर्ज की गई थी। हालांकि शेयर बाजार में इतिहास हर बार हूबहू खुद को दोहराए, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन, बाजार के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि FPIs की यह 17 साल के निचले स्तर की हिस्सेदारी भविष्य में उनकी मजबूत वापसी की ठोस जमीन तैयार कर रही है। अगर आने वाले दिनों में कंपनियों की कमाई मजबूत बनी रही और शेयरों का वैल्युएशन आकर्षक हुआ, तो विदेशी निवेशकों की वापसी से बाजार में एक बार फिर जोरदार तेजी देखने को मिल सकती है।