भारतीय शेयर बाजार में अप्रैल के नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ओर से भारी बिकवाली देखी जा रही है। 1 अरब डॉलर) की निकासी की है। यह बिकवाली वैश्विक अनिश्चितताओं और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के बीच हुई है, जिससे बाजार के सेंटिमेंट पर दबाव बना हुआ है।
इससे पहले मार्च के महीने में भी भारतीय बाजार से पूंजी की भारी निकासी दर्ज की गई थी और 17 lakh crore की रिकॉर्ड राशि निकाली थी। 5 lakh crore तक पहुंच गया है। हालांकि फरवरी में निवेश की स्थिति में कुछ सुधार देखा गया था, लेकिन वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस प्रवाह को फिर से नकारात्मक कर दिया है।
भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का प्रभाव
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी संघर्ष और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक निवेशकों के बीच अनिश्चितता पैदा कर दी है। युद्ध की स्थिति में निवेशक आमतौर पर उभरते बाजारों जैसे भारत से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि व्यापार घाटे और मुद्रास्फीति पर सीधा प्रभाव डालती है।
रुपये का अवमूल्यन और मुद्रा बाजार की स्थिति
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई गिरावट भी विदेशी निवेशकों की निकासी का एक प्रमुख कारण बनी है। रिपोर्टों के अनुसार, हालिया संघर्ष शुरू होने के बाद से रुपये के मूल्य में लगभग 4% की गिरावट दर्ज की गई है। विदेशी निवेशकों के लिए मुद्रा का कमजोर होना उनके कुल रिटर्न को प्रभावित करता है, जिससे वे भारतीय बाजार में अपने निवेश को कम करना पसंद कर रहे हैं। डॉलर की मजबूती ने वैश्विक स्तर पर अन्य मुद्राओं पर दबाव बनाया है।
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी
मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के शोध प्रबंधक हिमांशु श्रीवास्तव के अनुसार, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में हुई बढ़ोतरी ने भारतीय बाजार से पूंजी के बहिर्वाह को तेज किया है और जब अमेरिका जैसे विकसित बाजारों में बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक जोखिम वाली इक्विटी संपत्तियों से पैसा निकालकर सुरक्षित बॉन्ड मार्केट में निवेश करना अधिक उपयुक्त समझते हैं। यह प्रवृत्ति उभरते बाजारों के लिए पूंजी प्रवाह की चुनौती पेश करती है।
बाजार मूल्यांकन और संस्थागत दृष्टिकोण
जियोजित फाइनेंशियल सर्विसेज के मुख्य निवेश रणनीतिकार वीके विजयकुमार के अनुसार, लगातार हो रही बिकवाली के कारण भारतीय बाजार के मूल्यांकन (Valuation) में कुछ सुधार हुआ है और उनका कहना है कि कुछ क्षेत्रों में शेयरों की कीमतें अब ऐतिहासिक स्तरों के मुकाबले अधिक तर्कसंगत नजर आ रही हैं। हालांकि, विदेशी निवेश का प्रवाह फिर से शुरू होना काफी हद तक वैश्विक परिस्थितियों, विशेष रूप से कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता और भू-राजनीतिक तनाव में कमी पर निर्भर करेगा।
क्षेत्रवार बिकवाली का रुझान
डेटा के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने विशेष रूप से वित्तीय सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और तेल एवं गैस क्षेत्रों में अपनी हिस्सेदारी कम की है। इन क्षेत्रों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी होने के कारण बिकवाली का असर सूचकांकों पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने इस बिकवाली के बीच बाजार को संभालने का प्रयास किया है, लेकिन FPI की बड़ी निकासी ने बाजार की बढ़त को सीमित कर दिया है।