इनफर्टिलिटी के कारण: बदलती जीवनशैली और देर से शादी बढ़ा रही बांझपन, डॉक्टर की सलाह

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इनफर्टिलिटी के कारण: बदलती जीवनशैली और देर से शादी बढ़ा रही बांझपन, डॉक्टर की सलाह
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भारत में परिवार शुरू करने की उम्र में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव देखा गया है। पहले जहां शादी के कुछ ही वर्षों के भीतर बच्चे की योजना बना ली जाती थी, वहीं अब उच्च शिक्षा, करियर की महत्वाकांक्षाओं, वित्तीय मजबूती और बदलती जीवनशैली के कारण कई जोड़े 30 या 35 वर्ष की उम्र के बाद माता-पिता बनने का निर्णय ले रहे हैं। हालांकि ये सामाजिक बदलाव व्यक्तिगत प्रगति का संकेत हैं, लेकिन इनके साथ ही प्रजनन क्षमता यानी फर्टिलिटी में गिरावट जैसी गंभीर चुनौतियां भी तेजी से उभर रही हैं।

विशेषज्ञ की राय: इनफर्टिलिटी के बढ़ते आंकड़े

मैक्स हॉस्पिटल, पंचशील पार्क की डायरेक्टर और इनफर्टिलिटी एवं आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. श्वेता गुप्ता के अनुसार, भारत में वर्तमान में लगभग 10 से 15 प्रतिशत महिलाओं को गर्भधारण करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। देर से मातृत्व की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। डॉ. गुप्ता का कहना है कि चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के बावजूद, मानव शरीर की जैविक संरचना में उम्र एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

देर से शादी और करियर की प्राथमिकता

विशेषज्ञों के अनुसार, देर से माता-पिता बनने के पीछे कई सामाजिक और जीवनशैली से जुड़े कारण जिम्मेदार हैं। डॉ और श्वेता गुप्ता बताती हैं कि गर्भधारण न कर पाने का एक सबसे बड़ा कारण देर से शादी करना है। महिलाओं में 35 वर्ष की उम्र के बाद अंडों की संख्या और उनकी गुणवत्ता प्राकृतिक रूप से कम होने लगती है, जिससे गर्भधारण की संभावनाएं काफी घट जाती हैं। आज के समय में महिलाएं उच्च शिक्षा और करियर को अधिक प्राथमिकता दे रही हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने और पेशेवर लक्ष्यों को प्राप्त करने के बाद ही परिवार बढ़ाने का फैसला लिया जाता है, जो अक्सर जैविक घड़ी के साथ मेल नहीं खाता।

शहरी जीवनशैली और शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

शहरी जीवनशैली भी प्रजनन क्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जंक फूड का अधिक सेवन, मोटापा, शारीरिक सक्रियता की कमी और लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने की आदत शरीर के हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ सकती है। यह असंतुलन महिलाओं में ओव्यूलेशन की प्रक्रिया को प्रभावित करता है, जिससे गर्भधारण में बाधा आती है और आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खान-पान की गलत आदतें और व्यायाम का अभाव प्रजनन स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

तनाव और प्रदूषण का योगदान

शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी फर्टिलिटी में बड़ी भूमिका निभाता है। आज के दौर में तनाव और चिंता बांझपन के प्रमुख कारणों में से एक हैं। लगातार बना रहने वाला मानसिक दबाव शरीर के हार्मोनल सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे मासिक धर्म अनियमित हो सकता है और गर्भधारण में जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इसके अलावा, संयुक्त परिवारों के स्थान पर एकल परिवारों (न्यूक्लियर फैमिली) का चलन बढ़ने और बड़े शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण ने भी प्रजनन क्षमता पर बुरा असर डाला है।

फर्टिलिटी सुरक्षा: एग फ्रीजिंग का विकल्प

डॉ. श्वेता गुप्ता का सुझाव है कि यदि कोई महिला भविष्य में मां बनना चाहती है लेकिन वर्तमान में गर्भधारण की योजना नहीं है, तो सोशल एग फ्रीजिंग एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है और इस प्रक्रिया में 35 वर्ष की उम्र से पहले महिला के स्वस्थ अंडों को निकालकर एक विशेष तकनीक के माध्यम से सुरक्षित रख लिया जाता है। भविष्य में जब भी महिला गर्भधारण करना चाहे, इन अंडों का उपयोग आईवीएफ प्रक्रिया के जरिए किया जा सकता है और यह तकनीक उम्र बढ़ने के साथ अंडों की गुणवत्ता में होने वाली कमी के जोखिम को काफी हद तक कम कर देती है।

आईवीएफ और आधुनिक तकनीक से उम्मीद

यदि प्राकृतिक रूप से गर्भधारण में समस्या आ रही है, तो असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) जैसी तकनीकें वरदान साबित हो रही हैं। आईवीएफ प्रक्रिया के तहत महिला के अंडे और पुरुष के शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित किया जाता है और तैयार भ्रूण को गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। यह तकनीक ओव्यूलेशन संबंधी समस्याओं, फैलोपियन ट्यूब में ब्लॉकेज और पुरुषों में गंभीर बांझपन जैसी स्थितियों में भी काफी सफल रही है।

समय पर योजना बनाना है अनिवार्य

विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि करियर और परिवार दोनों ही जीवन के महत्वपूर्ण पहलू हैं, लेकिन जैविक घड़ी को अनदेखा करना जोखिम भरा हो सकता है। यदि कोई जोड़ा 30 वर्ष की उम्र के बाद परिवार की योजना बना रहा है, तो उन्हें समय-समय पर फर्टिलिटी जांच करानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। सही समय पर जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों की मदद लेकर माता-पिता बनने का सपना साकार किया जा सकता है।

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