ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह: GDP में 10.1 प्रतिशत की गिरावट और रिकॉर्ड महंगाई

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ईरान की अर्थव्यवस्था तबाह: GDP में 10.1 प्रतिशत की गिरावट और रिकॉर्ड महंगाई
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ईरान की अर्थव्यवस्था इस समय एक गहरे वित्तीय संकट के दौर से गुजर रही है। देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 10 दशमलव 1 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और युद्ध जैसी स्थितियों का सामना कर रहा है और ईरान सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, मार्च के अंत से लेकर जून के अंत के बीच देश की जीडीपी में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 10 दशमलव 1 प्रतिशत की कमी आई है। यह आंकड़ा फारसी कैलेंडर की पहली तिमाही का है, और इसी दौरान ईरान का अमेरिका और इजराइल के साथ तनाव चरम पर था।

भारत के साथ महंगाई की तुलना

ईरान में महंगाई की दर ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। अगस्त के महीने में ईरान की 12 महीने की औसत महंगाई दर 69 दशमलव 9 प्रतिशत दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने अनुमान लगाया है कि साल 2026 के लिए ईरान की औसत महंगाई 68 दशमलव 9 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। यदि इसकी तुलना भारत से की जाए, तो भारत की अगस्त 2026 की खुदरा महंगाई दर 4 दशमलव 82 प्रतिशत थी, जो जुलाई के 4 दशमलव 45 प्रतिशत से थोड़ी अधिक थी। इस लिहाज से ईरान की महंगाई भारत के मुकाबले करीब 14 दशमलव 3 गुना ज्यादा है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि ईरान में बुनियादी चीजों की कीमतें किस कदर बढ़ चुकी हैं।

तेल निर्यात में भारी गिरावट और प्रतिबंध

ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल और गैस के निर्यात पर टिकी हुई है, लेकिन युद्ध और अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया है। युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही काफी कम हो गई है, जो ईरान का मुख्य व्यापारिक मार्ग है। अमेरिका ने ईरान के तेल निर्यात पर फिर से नाकाबंदी लागू कर दी है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में ईरान से कच्चे तेल की लोडिंग करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन थी, जो अगस्त में घटकर सिर्फ 2 लाख 20 हजार से 2 लाख 55 हजार बैरल प्रतिदिन रह गई है। तेल निर्यात में इस भारी कमी की वजह से ईरान के लिए विदेशी मुद्रा जुटाना बहुत मुश्किल हो गया है। ईरानी संसद के स्पीकर और मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा था कि पिछली नाकाबंदी के दौरान ईरान एक बैरल तेल तक निर्यात नहीं कर पाया था।

मुद्रा का अवमूल्यन और जनता पर असर

ईरानी मुद्रा रियाल की गिरती कीमत ने हालात को और भी खराब कर दिया है। सितंबर की शुरुआत में खुले बाजार में 1 डॉलर की कीमत 22 लाख रियाल से ज्यादा हो गई, जबकि एक साल पहले यह करीब 10 लाख रियाल थी। मुद्रा के इस अवमूल्यन के कारण खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। अगस्त में उपभोक्ता कीमतें पिछले साल के मुकाबले 84 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गईं। आईएमएफ ने 2026 में ईरान की वास्तविक जीडीपी में 5 दशमलव 4 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया है, जो यह संकेत देता है कि आर्थिक संकट अभी और गहरा सकता है।

इंडस्ट्री पर दबाव और उत्पादन का खतरा

युद्ध और कच्चे माल की कमी की वजह से ईरान के उद्योग भी भारी दबाव में हैं। अगस्त में कच्चे माल का स्टॉक इंडेक्स 39 दशमलव 3 रहा, जो जुलाई के 44 दशमलव 5 से काफी नीचे है। वहीं, अर्थव्यवस्था का पीएमआई 46 दशमलव 9 दर्ज किया गया। गौरतलब है कि 50 से कम पीएमआई आर्थिक गतिविधियों में गिरावट को दर्शाता है। ईरान के स्टेटिस्टिक्स सेंटर के मुताबिक, सालाना महंगाई दर करीब 69 प्रतिशत तक पहुंच गई है। चैंबर ने चेतावनी दी है कि अगर मौजूदा हालात जारी रहे, तो कच्चे माल और सामान का भंडार पूरी तरह खत्म हो सकता है, जिससे उत्पादन क्षमता में भारी कमी आएगी। कई फैक्ट्रियों की उत्पादन लाइनें धीमी पड़ गई हैं या पूरी तरह बंद होने की कगार पर हैं। इस आर्थिक तबाही को रोकने के लिए ईरान को युद्ध और कच्चे माल की कमी जैसे मुद्दों पर तत्काल ध्यान देना होगा।

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