ईरान में नेतृत्व का टकराव: युद्ध पर कट्टरपंथी और उदारवादी मौलवी आमने-सामने

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ईरान में नेतृत्व का टकराव: युद्ध पर कट्टरपंथी और उदारवादी मौलवी आमने-सामने
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अमेरिका और इजराइल के साथ चल रहे युद्ध ने ईरान के धार्मिक नेतृत्व (क्लर्जी) के भीतर खुलकर मतभेद सामने ला दिए हैं। एक तरफ कट्टरपंथी नेता युद्ध को और बढ़ाने की बात कर रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ उदारवादी आवाजें लगातार लड़ाई के भारी नुकसान को देखते हुए बातचीत का रास्ता अपनाने की सलाह दे रही हैं। हाल के हफ्तों में दोनों पक्षों के बीच संकट कम करने के प्रस्ताव भेजे गए हैं, लेकिन वॉशिंगटन और तेहरान के बीच अभी भी बड़ी असहमति बनी हुई है।

कट्टरपंथी नेताओं का कड़ा रुख और सैन्य धमकियां

ईरान इंटरनेशनल की खबर के मुताबिक, कट्टरपंथी मौलवी और सांसद महमूद नबावियन ने स्पष्ट किया है कि यदि अमेरिका ने दोबारा हमला किया, तो ईरान बड़ा और कठोर जवाब देगा। उन्होंने चेतावनी दी कि ईरान उन अरब देशों के इलाकों को निशाना बनाएगा जहां अमेरिका के सैन्य अड्डे और ठिकाने मौजूद हैं। इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी हार स्वीकार करने की सलाह दी है। इसी क्रम में एक अन्य कट्टरपंथी सांसद अली खेजरियन ने कहा कि ईरान युद्ध का समर्थन जारी रखेगा और अमेरिका के साथ हर तरह की बातचीत बंद कर देनी चाहिए और उनके अनुसार, मीडिया या किसी मध्यस्थ के जरिए भी कोई संदेश नहीं भेजा जाना चाहिए।

उदारवादी गुट की चेतावनी और बातचीत की वकालत

इसके विपरीत, उदारवादी मौलवी और मानवाधिकार वकील मोहसिन रोहामी ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध से ईरान को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई करने में सालों लग सकते हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि देश की स्टील फैक्ट्रियां, रिफाइनरी, बिजली और गैस के बड़े ढांचे तबाह हो चुके हैं और रोहामी ने तर्क दिया कि जो लोग अमेरिका से बातचीत का विरोध कर रहे हैं, उन्हें युद्ध में हुई जान-माल की तबाही के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उनका मानना है कि शांति एक सामान्य स्थिति है और युद्ध केवल एक अपवाद है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की सड़कों पर आम जनता बातचीत का विरोध नहीं कर रही है और यह न केवल जनता की मांग है बल्कि एक रणनीतिक जरूरत भी है और उन्होंने स्पष्ट किया कि बातचीत का अंतिम फैसला सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और वरिष्ठ निकायों द्वारा ही लिया जाएगा।

रणनीतिक भूलों पर आंतरिक विश्लेषण

ईरान की वेबसाइट ‘अस्र ईरान’ पर प्रकाशित एक विश्लेषण में कट्टरपंथियों की चार बड़ी रणनीतिक भूलों को रेखांकित किया गया है। इसमें कहा गया है कि कट्टरपंथियों ने अमेरिका और इजराइल की सैन्य शक्ति को कम आंका और केवल दुश्मन के नुकसान पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि ईरान को होने वाले भारी खर्चों और नुकसान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। विश्लेषण में यह भी बताया गया कि पश्चिमी दुश्मनों को आंतरिक रूप से कमजोर या ढहता हुआ दिखाना एक बड़ी गलती है, क्योंकि युद्ध के समय लोकतांत्रिक देशों में आपसी मतभेद कम हो जाते हैं। यदि इसी दोषपूर्ण सोच के आधार पर निर्णय लिए गए, तो ईरान अपनी वर्तमान स्थिति और युद्ध को सम्मानजनक अंत तक ले जाने का अवसर दोनों खो सकता है।

ईरान के भीतर यह वैचारिक संघर्ष ऐसे समय में हो रहा है जब क्षेत्रीय तनाव चरम पर है। कट्टरपंथियों और उदारवादियों के बीच यह खींचतान न केवल ईरान की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर रही है, बल्कि भविष्य की कूटनीतिक दिशा को भी अनिश्चित बना रही है।

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