ईरान और अमेरिका-इजराइल गठबंधन के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब अपने आठवें दिन में प्रवेश कर चुका है। आधिकारिक सैन्य रिपोर्टों और रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस संक्षिप्त अवधि में दोनों पक्षों की ओर से कुल मिलाकर 8,000 से अधिक हमले किए गए हैं। इस युद्ध का स्वरूप मुख्य रूप से हवाई हमलों, मिसाइल दागने और ड्रोन ऑपरेशंस तक सीमित रहा है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सेनाओं ने अब तक लगभग 4,500 हवाई हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमता का प्रदर्शन करते हुए लगभग 3,500 हमले किए हैं। इन हमलों में 905 बैलिस्टिक मिसाइलें शामिल हैं, जो लंबी दूरी तक मार करने और भारी तबाही मचाने में सक्षम हैं। सैन्य अधिकारियों के अनुसार, यह संघर्ष आधुनिक युग के सबसे तीव्र मिसाइल और हवाई युद्धों में से एक बन गया है।
अमेरिका और इजराइल की हवाई सैन्य कार्रवाई का विस्तार
अमेरिका और इजराइल की ओर से किए गए 4,500 हमलों में अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों और सटीक मार करने वाले हथियारों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, इन अभियानों में F-35 एडवांस्ड स्टील्थ फाइटर, F-15 और F-16 जैसे विमानों ने मुख्य भूमिका निभाई है। हमलों का प्राथमिक लक्ष्य ईरान के सैन्य बुनियादी ढांचे को नष्ट करना रहा है और इसमें ईरान के भूमिगत मिसाइल साइलो, रडार स्टेशन, कमांड और कंट्रोल सेंटर और ड्रोन निर्माण इकाइयों को निशाना बनाया गया है। इसके अतिरिक्त, इजराइली वायु सेना ने प्रिसिजन-गाइडेड म्यूनिशन (PGM) और बंकर-बस्टर बमों का उपयोग किया है ताकि ईरान की सुरक्षात्मक परतों को भेदा जा सके और अमेरिकी नौसेना ने भी लाल सागर और भूमध्य सागर में तैनात अपने युद्धपोतों से क्रूज मिसाइलें दागकर इन हमलों में सहयोग किया है।
ईरान की मिसाइल शक्ति और जवाबी प्रहार की रणनीति
ईरान ने अपनी जवाबी कार्रवाई में 'वेक्टर' आधारित हमले की रणनीति अपनाई है। सैन्य शब्दावली में 'वेक्टर' का अर्थ उन सभी प्रणालियों से है जो हथियार को लक्ष्य तक ले जाती हैं। ईरान ने लगभग 3,500 ऐसे हथियारों का उपयोग किया है, जिनमें बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन (UAV) शामिल हैं। विशेष रूप से 905 बैलिस्टिक मिसाइलों का प्रक्षेपण ईरान की लंबी दूरी की मारक क्षमता को दर्शाता है। इन मिसाइलों में 'खैबर शिकन', 'फत्ताह' और 'शहाब' श्रेणी की मिसाइलें शामिल होने की सूचना है। ईरान का मुख्य उद्देश्य इजराइल के हवाई ठिकानों और रणनीतिक बंदरगाहों को निशाना बनाना रहा है। इसके साथ ही, ईरान ने बड़ी संख्या में 'शाहिद' श्रेणी के ड्रोन्स का उपयोग किया है, जिनका उद्देश्य दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को व्यस्त रखना और उन्हें भ्रमित करना है।
हवाई रक्षा प्रणालियों (Air Defense) के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा
इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण पहलू दोनों पक्षों की हवाई रक्षा प्रणालियों की प्रभावशीलता है। इजराइल ने अपनी बहुस्तरीय सुरक्षा प्रणाली का उपयोग किया है, जिसमें 'आयरन डोम' (Iron Dome) छोटी दूरी के रॉकेटों के लिए, 'डेविड स्लिंग' (David's Sling) मध्यम दूरी की मिसाइलों के लिए और 'एरो' (Arrow) प्रणाली लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को वायुमंडल के बाहर रोकने के लिए तैनात की गई है। अमेरिका ने इस सुरक्षा घेरे को और मजबूत करने के लिए 'पैट्रियट' (Patriot) मिसाइल सिस्टम और 'थाड' (THAAD) रडार सिस्टम को सक्रिय किया है। दूसरी ओर, ईरान ने अपनी रक्षा के लिए 'बावर-373' (Bavar-373) और 'खोरदाद-15' (Khordad-15) जैसी स्वदेशी प्रणालियों के साथ-साथ रूसी मूल की प्रणालियों का उपयोग किया है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह युद्ध इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा पक्ष दुश्मन की मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने में अधिक सफल रहता है।
आधुनिक युद्धक विमानों और ड्रोन्स का सामरिक उपयोग
इस संघर्ष में मानवरहित हवाई वाहनों (UAV) और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का समन्वय एक नया मानक स्थापित कर रहा है। अमेरिका और इजराइल ने टोही ड्रोन्स का उपयोग करके ईरान के गतिशील मिसाइल लॉन्चरों की सटीक स्थिति का पता लगाया है। इसके बाद, लड़ाकू विमानों ने उन पर त्वरित हमले किए हैं। ईरान ने भी 'स्वार्म ड्रोन' तकनीक का उपयोग करने का प्रयास किया है, जहां एक साथ दर्जनों ड्रोन छोड़े जाते हैं ताकि रक्षा प्रणालियों को ओवरलोड किया जा सके। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के ड्रोन्स ने इजराइल के रडार कवरेज को चुनौती देने के लिए कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की तकनीक अपनाई है। इस तकनीकी खींचतान ने युद्ध को केवल शारीरिक विनाश तक सीमित न रखकर एक उच्च-स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक और साइबर युद्ध में भी बदल दिया है।