ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए एक नई शांति योजना पर काम किया जा रहा है। इस योजना के तहत पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी जा सकती है। अल हदथ अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले युद्ध विराम और परमाणु समझौते में पाकिस्तान को गारंटर बनाने की तैयारी है। इसका सीधा मतलब यह है कि समझौते के अंतिम ड्राफ्ट पर ईरान और अमेरिका के साथ-साथ पाकिस्तान के भी हस्ताक्षर होंगे। इस महत्वपूर्ण फैसले पर कतर और अमेरिका जैसे देशों के बीच सहमति बन गई है।
दो चरणों में होगा शांति समझौता
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच यह शांति समझौता 2 चरणों में संपन्न हो सकता है। पहले चरण में दोनों पक्ष एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। इसके ठीक 60 दिनों के बाद अंतिम और पूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। दरअसल, ईरान किसी भी समझौते पर आगे बढ़ने से पहले एक मजबूत गारंटर की मांग कर रहा था और ईरान का तर्क है कि अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता है, क्योंकि पूर्व में भी समझौतों का पालन नहीं हुआ है। ऐसे में पाकिस्तान की मौजूदगी एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगी।
पाकिस्तान को गारंटर बनाने के पीछे की 5 बड़ी रणनीतियां
1. सैन्य दबाव और परमाणु शक्ति
पाकिस्तान और ईरान पड़ोसी मुल्क हैं और दोनों के बीच 909 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है। गारंटर के तौर पर पाकिस्तान ईरान पर प्रभावी दबाव बना सकता है। सैन्य तुलना में पाकिस्तान की स्थिति मजबूत है क्योंकि वह एक परमाणु संपन्न देश है, जबकि इस समझौते के बाद ईरान के पास कोई परमाणु हथियार नहीं होगा। फरवरी में जब ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या हुई थी, तब पाकिस्तान में हुए विरोध प्रदर्शनों को वहां के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने पूरी ताकत से दबा दिया था। मुनीर ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए प्रदर्शनकारियों से ईरान चले जाने तक को कह दिया था, जो उनके सख्त नियंत्रण को दर्शाता है।
2. मुस्लिम देशों का भरोसा जीतना
अमेरिका पाकिस्तान को आगे करके मिडिल ईस्ट के अन्य मुस्लिम देशों को विश्वास में लेना चाहता है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से ही डिफेंस डील मौजूद है। इसके अलावा तुर्की और कतर के साथ भी पाकिस्तान के संबंध काफी गहरे हैं। अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान के जरिए इन देशों को यह संदेश मिले कि भविष्य में उनके हितों के साथ कुछ गलत नहीं होगा।
3. रूस और चीन को दूर रखने की चाल
अगर रूस या चीन इस समझौते में गारंटर बनते, तो भविष्य में अमेरिका के लिए ईरान पर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता। पाकिस्तान के गारंटर बनने से अमेरिका पर ऐसी कोई अंतरराष्ट्रीय मजबूरी नहीं होगी। पाकिस्तान ईरान पर तो दबाव डाल सकता है, लेकिन वह रूस या चीन की तरह अमेरिका के आक्रामक रुख को पूरी तरह नहीं रोक पाएगा।
4. दक्षिण एशिया और बगराम बेस पर नजर
अमेरिका की कोशिश पाकिस्तान को इस डील के जरिए खुश रखने की भी है ताकि दक्षिण एशिया में अपने अन्य लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। अमेरिका की नजर तालिबान और उसके ठिकानों पर है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार बगराम बेस को वापस लेने की बात कह चुके हैं। यह बेस चीन की सीमा के काफी नजदीक है और इसे हासिल करने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान के सहयोग की सख्त जरूरत होगी।
5. सीमा निगरानी और ऐतिहासिक संदर्भ
पाकिस्तान और ईरान की 909 किलोमीटर लंबी सीमा अमेरिका के लिए निगरानी का सबसे बड़ा जरिया है। अगर ईरान गुप्त तरीके से अपना परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू करता है, तो पाकिस्तान के जरिए अमेरिका को इसकी तुरंत जानकारी मिल सकती है और डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा था कि तेहरान को पाकिस्तान से बेहतर कोई नहीं जानता। ऐतिहासिक रूप से भी पाकिस्तान के परमाणु जनक अब्दुल कादिर खान पर ईरान को परमाणु जानकारी देने के आरोप लगे थे, जिससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान के पास ईरान के परमाणु तंत्र की गहरी समझ है।