इन कागजी समझौतों से नहीं मिलेगी सुरक्षा पाक तुर्किये के साथ सऊदी अरब की डिफेंस डील पर ईरान का तंज

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इन कागजी समझौतों से नहीं मिलेगी सुरक्षा पाक तुर्किये के साथ सऊदी अरब की डिफेंस डील पर ईरान का तंज
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ईरान ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हाल ही में संपन्न हुए नए रक्षा समझौते पर अत्यंत तीखी और कड़वी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ईरान का स्पष्ट रूप से मानना है कि यह त्रिपक्षीय समझौता केवल एक कागजी दस्तावेज है जो सऊदी अरब को वह स्थायी सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता जिसकी वह तलाश कर रहा है। ईरानी नेतृत्व ने इस रक्षा साझेदारी को लेकर अपनी गहरी असहमति जताई है और इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अपर्याप्त बताया है।

ईरानी अधिकारी का तीखा हमला और तंज

ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के सदस्य इब्राहिम रजाई ने इस समझौते की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रजाई ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान और तुर्किये के साथ किया गया कोई भी सुरक्षा समझौता सऊदी अरब के लिए स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकता। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि सऊदी अरब को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ केवल एक कागजी समझौते पर हस्ताक्षर करने से उन्हें सुरक्षा प्राप्त नहीं होगी। उन्होंने इसकी तुलना सऊदी अरब की अमेरिका पर पुरानी निर्भरता से की। रजाई ने तर्क दिया कि जिस प्रकार दशकों तक अमेरिकियों पर एकतरफा निर्भर रहने के बावजूद सऊदी अरब को पूर्ण सुरक्षा नहीं मिल सकी, उसी तरह यह नया समझौता भी उन्हें सुरक्षा देने में विफल रहेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि सऊदी अरब अपनी नीतियों में मौलिक सुधार करता है, तो उसे अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दूसरे देशों के सामने भीख मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता

यह विवाद मक्का में हस्ताक्षरित ऐतिहासिक मक्का संयुक्त रक्षा समझौते से शुरू हुआ है। इस रक्षा सौदे के तहत सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने एक महत्वपूर्ण सुरक्षा क्लॉज पर सहमति जताई है। इस समझौते की सबसे बड़ी शर्त यह है कि यदि इन तीनों देशों में से किसी भी एक देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य तीनों देशों की सामूहिक रक्षा क्षमता और प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन मक्का के अल सफा पैलेस में एकत्रित हुए थे। इस उच्च स्तरीय बैठक के दौरान ही इस संयुक्त रक्षा समझौते को अंतिम रूप दिया गया और तुर्किये सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस समझौते की प्रकृति को पूरी तरह से रक्षात्मक बताया है और कहा है कि तीनों पक्षों ने केवल रक्षा के क्षेत्र में एक-दूसरे का सहयोग करने का वादा किया है।

संयुक्त बयान और सऊदी अरब का स्पष्टीकरण

समझौते के बाद जारी किए गए संयुक्त बयान में कहा गया है कि मक्का समझौता तीनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंधों का परिणाम है। यह समझौता भाईचारे और इस्लामी एकजुटता के उन मजबूत बंधनों पर आधारित है जो इन देशों को आपस में जोड़ते हैं। इसका लक्ष्य उनके साझा रणनीतिक हितों को बढ़ावा देना और रक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाना है। दूसरी ओर, सऊदी अरब ने इस समझौते को लेकर उठ रहे विभिन्न सवालों पर अपना रुख स्पष्ट किया है। सऊदी अरब ने कहा है कि यह समझौता किसी नए सैन्य गठबंधन या धार्मिक आधार पर बने किसी गुट की शुरुआत नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाना और आपसी सहयोग को मजबूत करना है और सऊदी अरब ने यह भी साफ किया कि इस समझौते का परमाणु गतिविधियों या हथियारों की होड़ से कोई लेना-देना नहीं है। साथ ही, यह भी स्पष्ट किया गया कि इस समझौते से अन्य देशों के साथ सऊदी अरब के मौजूदा रणनीतिक संबंधों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।

नाटो से तुलना और रणनीतिक निहितार्थ

इस समझौते की तुलना अक्सर नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन से की जा रही है। इसका मुख्य कारण समझौते में शामिल वह सुरक्षा क्लॉज है जो नाटो के चार्टर से मिलता-जुलता है। नाटो में भी यह नियम है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है और सभी देश मिलकर उसका मुकाबला करते हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच हुआ यह समझौता भी इसी सिद्धांत पर काम करेगा। विशेषज्ञ इसे सऊदी अरब की उस रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं जिसके तहत वह अपनी रक्षा साझेदारियों में विविधता लाना चाहता है और किसी एक देश पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है।

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