पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए अमेरिका के साथ बातचीत के सभी रास्तों को बंद करने का संकेत दिया है। बुधवार को ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के वरिष्ठ सहयोगी मोहम्मद मुखबेर ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट किया कि तेहरान का वाशिंगटन के साथ बातचीत करने का कोई इरादा नहीं है और मुखबेर के अनुसार, ईरान अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और जब तक आवश्यक होगा, वह इस संघर्ष को जारी रखने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं क्षीण होती दिख रही हैं।
पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव की स्थिति
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब सीधे सैन्य टकराव में बदलता दिख रहा है। मोहम्मद मुखबेर के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान पीछे हटने के मूड में नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड्स कोर (IRGC) ने घोषणा की है कि उसने अमेरिका और इजराइल के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हमलों की 17वीं लहर शुरू कर दी है। IRGC की जमीनी सेना ने इन हमलों को तीन बड़े अभियानों के रूप में वर्गीकृत किया है, जिन्हें इजराइल और अमेरिका द्वारा किए गए पिछले हमलों का जवाब बताया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, इन अभियानों का उद्देश्य क्षेत्र में विदेशी सैन्य उपस्थिति को चुनौती देना है।
ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4 और ड्रोन हमले
IRGC के जनसंपर्क विभाग ने 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4' के एक नए चरण की शुरुआत की पुष्टि की है। सैन्य अधिकारियों के अनुसार, इस अभियान के तहत ईरान की जमीनी सेना ने कब्जे वाले क्षेत्रों और क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की ओर 230 से अधिक हमलावर ड्रोन लॉन्च किए हैं। इन ड्रोनों ने कई चरणों में उड़ान भरी और उत्तरी इराक के इरबिल, कुवैत और अन्य रणनीतिक स्थानों पर स्थित सैन्य बुनियादी ढांचों को निशाना बनाया। IRGC के बयान में कहा गया है कि उत्तरी इराक में सक्रिय आतंकवादी समूहों के मुख्यालयों को भी इन हमलों में नष्ट कर दिया गया है। सैन्य कमांडरों ने इसे अपनी रक्षात्मक रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।
अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर प्रभाव का दावा
ईरानी सैन्य अधिकारियों ने दावा किया है कि उनके जवाबी हमलों ने बहरीन में स्थित एक प्रमुख अमेरिकी हवाई अड्डे की गतिविधियों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। IRGC के अनुसार, इन हमलों में कई कमांड सेंटर नष्ट हो गए हैं और संचार प्रणालियों को भारी नुकसान पहुंचा है। ईरानी मीडिया द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, युद्ध के शुरुआती दो दिनों में विभिन्न अमेरिकी ठिकानों पर किए गए हमलों में 680 से अधिक सैनिक हताहत हुए हैं। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है। ईरानी अधिकारियों ने जोर देकर कहा है कि अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना उनकी सैन्य रणनीति का हिस्सा है ताकि क्षेत्र में विदेशी हस्तक्षेप को कम किया जा सके।
कानूनी पक्ष और आत्मरक्षा का तर्क
ईरान ने अपने सैन्य कदमों को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में सही ठहराने का प्रयास किया है। ईरानी विदेश मंत्रालय और सैन्य अधिकारियों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 का हवाला देते हुए कहा है कि उनके पास आक्रामक कृत्यों के खिलाफ आत्मरक्षा का कानूनी अधिकार है। अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान की क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ की गई कार्रवाइयों ने तेहरान को जवाबी कार्रवाई के लिए मजबूर किया है। ईरान का तर्क है कि वह केवल अपनी सीमाओं और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है और उसकी कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप है।
साइबर युद्ध और डेटा लीक की चेतावनी
सैन्य संघर्ष के साथ-साथ अब यह लड़ाई साइबर क्षेत्र में भी फैल गई है और फिलिस्तीन समर्थक हैक्टिविस्ट समूह 'हंडाला' ने इजराइली राष्ट्रीय सुरक्षा अध्ययन संस्थान (INSS) के नेटवर्क में सेंध लगाने का दावा किया है। इस समूह का कहना है कि उन्होंने संस्थान के सर्वर से गोपनीय दस्तावेज, गुप्त पत्राचार, रिकॉर्डिंग और सुरक्षा बुलेटिन प्राप्त कर लिए हैं। हंडाला ने चेतावनी दी है कि वे जल्द ही इन बेहद संवेदनशील दस्तावेजों को सार्वजनिक करेंगे और इस साइबर हमले ने इजराइल के सुरक्षा संस्थानों की डिजिटल सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं और इसे ईरान समर्थित समूहों की एक बड़ी रणनीतिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है।