इजराइल में हालिया चुनावी नतीजे सामने आने के बाद अब देश के अगले प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर एक बड़ा पेच फंस गया है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में स्थिति बेहद पेचीदा हो चुकी है क्योंकि न तो वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पास प्रधानमंत्री बनने के लिए अपने दम पर आवश्यक बहुमत है और न ही उनके धुर विरोधी और पूर्व आईडीएफ चीफ गादी आइजनकोट के पास पूर्ण बहुमत का आंकड़ा उपलब्ध है। हालांकि गादी आइजनकोट के पास अरब पार्टियों से समर्थन लेने का रास्ता खुला हुआ है, लेकिन इस विकल्प की गुंजाइश बेहद कम नजर आ रही है और ऐसे में इजराइल की सियासत के इस अहम मोड़ पर अब पूरी दुनिया और खासकर इजराइल की जनता की नजरें अमेरिका पर टिक गई हैं कि वहां से क्या निर्देश और फैसले आते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट ने तूल पकड़ लिया है और रिपोर्ट के मुताबिक व्हाइट हाउस सक्रिय रूप से बेंजामिन नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच सुलह कराने की कोशिशों में जुटा हुआ है। व्हाइट हाउस की यह स्पष्ट मंशा है कि इजराइल में केवल दक्षिणपंथी पार्टियों की ही सरकार का गठन होना चाहिए और इसके पीछे मुख्य कारण यह माना जा रहा है कि यदि सरकार के गठन में अरब पार्टियों का किसी भी प्रकार का दखल होता है, तो पूरा राजनीतिक समीकरण और अमेरिका की क्षेत्रीय रणनीति खराब हो सकती है। अमेरिकी कूटनीति इस बात पर जोर दे रही है कि तेल अवीव में एक मजबूत और स्थिर दक्षिणपंथी प्रशासन स्थापित हो।
इस बीच दोनों प्रमुख नेताओं की तरफ से भी इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दिए गए हैं। इजराइल के वर्तमान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा है कि देश को एक मजबूत राइट विंग की सरकार बनानी होगी, ताकि ईरान की तरफ से लगातार मिल रहे खतरे को दूर किया जा सके और देश की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और दूसरी तरफ, पूर्व आईडीएफ चीफ गादी आइजनकोट ने भी अरब पार्टियों से किसी भी तरह का सहयोग लेने के प्रस्ताव को पूरी तरह से ठुकरा दिया है। उन्होंने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा है कि देश सेवा के लिए एक यहूदी सरकार हम बनाएंगे, जिससे यह साफ होता है कि वे अरब दलों के साथ जाने के पक्ष में नहीं हैं।
इजराइल के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा बहुत तेज हो गई है कि क्या इन दोनों धुर विरोधियों के बीच किसी प्रकार का गठबंधन संभव हो पाएगा। इस संभावना के पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजहें बताई जा रही हैं। पहली वजह यह है कि नेतन्याहू और आइजनकोट दोनों की विचारधाराओं में काफी समानता है और वे कई राष्ट्रीय मुद्दों पर एक जैसा सोचते हैं और दूसरी और सबसे बड़ी वजह अमेरिका का भारी कूटनीतिक दबाव है। मौजूदा स्थिति में इजराइल खुद से कोई भी बड़ा स्वतंत्र फैसला लेने की स्थिति में नहीं है। चुनाव के आखिरी वक्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल अवीव की राजनीति में सीधे तौर पर दखल दिया था।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बात का जिक्र किया था कि चुनाव के उस दौर में जब नेतन्याहू बुरी तरह चुनाव हार रहे थे, तब उन्होंने खुलकर उनका समर्थन किया और उन्हें जीत की स्थिति में ला खड़ा किया। इस वक्त मिडिल ईस्ट का जो पूरा जियोपॉलिटिकल सिनेरियो बना हुआ है, उसमें इजराइल के लिए अमेरिका का विरोध करना, और विशेष तौर पर डोनाल्ड ट्रंप का विरोध करना किसी भी सूरत में मुमकिन नहीं है और अमेरिकी समर्थन और दबाव के बिना इजराइल की घरेलू और विदेशी नीति का संचालन बेहद कठिन माना जा रहा है, और यही वजह है कि वाशिंगटन का हर फैसला इजराइल की सियासत की दशा और दिशा तय कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसी स्थिति बनती है जिसमें दोबारा चुनाव में जाना पड़े, तो यह कदम गादी आइजनकोट के लिए बेहद भारी और घातक साबित हो सकता है। चुनाव के इन परिणामों के बाद नेतन्याहू अपनी राजनीतिक स्थिति को और अधिक मजबूत करने में कामयाब हो सकते हैं और वहीं दूसरी ओर, हालिया चुनाव में अरब पार्टियों के अप्रत्याशित उभार ने इजराइल के यहूदी नागरिकों को गहरे सदमे और चिंता में डाल दिया है। इतिहास में यह पहला मौका है जब इजराइल की राजनीति में अरब पार्टियों की स्थिति इतनी मजबूत होकर उभरी है, जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है।
इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अरब पार्टियों पर चुनाव चुराने का बेहद गंभीर आरोप लगाया है। यह मुद्दा आने वाले समय में इजराइल की राजनीति में एक बहुत बड़ा विवाद और राष्ट्रीय बहस का विषय बनने वाला है और जब तक अमेरिका की मध्यस्थता से नेतन्याहू और आइजनकोट के बीच कोई ठोस समझौता या गठबंधन का फॉर्मूला बाहर नहीं आता, तब तक इजराइल का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इस पर असमंजस बरकरार रहेगा और अंतिम फैसला अमेरिका की टेबल से ही तय होता दिखाई दे रहा है।