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जयप्रकाश एसोसिएट्स की शेयर बाजार से विदाई: रिटेल निवेशकों का पैसा डूबने का खतरा, जानें क्या हैं विकल्प

जयप्रकाश एसोसिएट्स की शेयर बाजार से विदाई: रिटेल निवेशकों का पैसा डूबने का खतरा, जानें क्या हैं विकल्प
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जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) के लिए शेयर बाजार का सफर अब समाप्ति की ओर है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में चल रही दिवालियापन की प्रक्रिया के तहत इस इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को अब शेयर बाजार से हटाने यानी डीलिस्ट करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। यह खबर उन हजारों रिटेल निवेशकों के लिए एक बड़ा झटका है जिन्होंने इस उम्मीद में कंपनी के शेयर खरीदे थे कि शायद भविष्य में कंपनी की स्थिति में सुधार होगा। जब कोई कंपनी दिवालिया होकर डीलिस्ट होती है, तो उसकी लिक्विडिटी यानी शेयरों की खरीद-बिक्री पूरी तरह से खत्म हो जाती है।

डीलिस्टिंग का निवेशकों पर क्या होगा असर?

एक बार जब जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड आधिकारिक तौर पर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) से डीलिस्ट हो जाएगी, तो रिटेल निवेशकों के सामने एक कठिन स्थिति पैदा होगी। निवेशक अपने डिमैट अकाउंट से इन शेयरों को सामान्य तरीके से नहीं बेच पाएंगे क्योंकि बाजार में इनका कोई खरीदार उपलब्ध नहीं होगा और तकनीकी रूप से ये शेयर डिमैट अकाउंट में मौजूद तो रहेंगे, लेकिन उनकी वैल्यू शून्य दिखाई देगी। इन्हें फ्रीज्ड या अनलिस्टेड शेयर कहा जाता है। इस स्थिति में निवेशकों की पूंजी पूरी तरह से फंस जाती है और उसे निकालने का कोई सीधा रास्ता नहीं बचता है।

कंपनी की डीलिस्टिंग के पीछे के मुख्य कारण

जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड लंबे समय से भारी कर्ज और गंभीर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रही थी। कंपनी द्वारा कर्जदाताओं की बकाया राशि का भुगतान न कर पाने के कारण इसके खिलाफ दिवालियापन कानून के तहत समाधान प्रक्रिया शुरू की गई थी। नियमों के अनुसार, जब किसी कंपनी को दिवालिया घोषित किया जाता है और उसकी संपत्तियों की बिक्री या किसी अन्य कंपनी द्वारा अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके शेयरों की सार्वजनिक ट्रेडिंग को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाता है। यही कारण है कि जेएएल को अब शेयर बाजारों से हमेशा के लिए हटाया जा रहा है।

वाटरफॉल मैकेनिज्म: किसे मिलेगा पैसा?

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड (IBC) के तहत जब किसी दिवालिया कंपनी की संपत्तियों को बेचा जाता है, तो प्राप्त राशि के वितरण के लिए एक सख्त नियम का पालन किया जाता है जिसे वाटरफॉल मैकेनिज्म कहते हैं। इस नियम के अनुसार, सबसे पहले दिवालियापन प्रक्रिया के खर्चों का भुगतान किया जाता है। इसके बाद सुरक्षित कर्जदाताओं जैसे कि सरकारी और निजी बैंकों और कर्मचारियों के बकाया वेतन का नंबर आता है। इसके बाद असुरक्षित कर्जदाताओं और सरकार के टैक्स आदि का भुगतान किया जाता है। इक्विटी शेयरधारक और रिटेल निवेशक इस सूची में सबसे अंत में आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि कंपनी पर बैंकों का ही हजारों करोड़ रुपये का बकाया है, इसलिए संपत्तियों की बिक्री से मिलने वाली रकम बैंकों का कर्ज चुकाने में ही खत्म हो जाएगी और रिटेल निवेशकों के हाथ खाली रह जाएंगे।

निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण सबक

बाजार के जानकारों का कहना है कि जयप्रकाश एसोसिएट्स का यह मामला उन निवेशकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो केवल कम कीमत देखकर कर्ज में डूबी कंपनियों के शेयरों में निवेश करते हैं और डीलिस्टिंग के बाद रिकवरी की उम्मीदें न के बराबर होती हैं। शेयर बाजार में निवेश करते समय हाई रिस्क के साथ जुड़े टोटल लॉस के जोखिम को समझना बहुत जरूरी है। यह मामला भविष्य में पूंजी के विनाश से बचने के लिए एक महत्वपूर्ण सबक के रूप में देखा जा रहा है। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे ऐसी कंपनियों से दूर रहें जो गंभीर वित्तीय संकट और कानूनी प्रक्रियाओं का सामना कर रही हों।

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