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जापान की रक्षा नीति में ऐतिहासिक बदलाव: घातक हथियारों के निर्यात से हटा बैन, चीन में खलबली

जापान की रक्षा नीति में ऐतिहासिक बदलाव: घातक हथियारों के निर्यात से हटा बैन, चीन में खलबली
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जापान की रक्षा नीति में एक युगांतरकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। जापान ने मंगलवार को खतरनाक और जानलेवा हथियारों के निर्यात पर लगा अपना दशकों पुराना प्रतिबंध आधिकारिक तौर पर हटा दिया है। यह कदम जापान की द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शांतिवादी नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव माना जा रहा है। जापान अब चीन और उत्तर कोरिया की बढ़ती आक्रामकता को देखते हुए अपने घरेलू हथियार उद्योग को वैश्विक स्तर पर मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के मंत्रिमंडल की ओर से नई गाइडलाइन को मंजूरी मिलने के साथ ही कई घातक हथियारों की बिक्री में आने वाली आखिरी कानूनी रुकावटें भी दूर हो गई हैं। इन हथियारों में अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान और कॉम्बैट ड्रोन जैसे अत्याधुनिक उपकरण शामिल हैं।

चीन की तीखी आलोचना और वैश्विक प्रतिक्रिया

जापान के इस बड़े नीतिगत बदलाव पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। चीन ने जापान के इस कदम की कड़ी आलोचना की है और इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा बताया है और दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया जैसे जापान के प्रमुख रक्षा सहयोगियों ने इस निर्णय का बड़े पैमाने पर स्वागत किया है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ-साथ यूरोप ने भी जापान के इस नए रुख में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। हालांकि, इस नीति के विरोधियों का तर्क है कि यह बदलाव जापान के शांतिवादी संविधान का सीधा उल्लंघन करता है और विरोधियों का कहना है कि इससे न केवल वैश्विक तनाव में वृद्धि होगी, बल्कि जापानी नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी नया खतरा पैदा हो सकता है।

सुरक्षा माहौल और रणनीतिक आवश्यकता

जापान के मुख्य कैबिनेट सचिव मिनोरू किहारा ने इस निर्णय के पीछे के कारणों को स्पष्ट करते हुए पत्रकारों से बात की। उन्होंने कहा कि नई नीति जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य है और किहारा के अनुसार, जापान के आसपास का सुरक्षा माहौल बहुत तेजी से बदल रहा है, और यह नीति इस क्षेत्र के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार रक्षा उपकरणों के हस्तांतरण को रणनीतिक रूप से बढ़ावा देगी। इसका उद्देश्य एक ऐसा सुरक्षा माहौल तैयार करना है जो जापान के हितों के अनुकूल हो और एक ऐसा औद्योगिक आधार विकसित करना है जो देश की युद्धक क्षमता को मजबूती से सहारा दे सके।

निर्यात नियमों में बदलाव और 17 देशों की सूची

जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनाए गए अपने शांतिवादी संविधान के तहत लंबे समय तक अधिकांश हथियारों के निर्यात पर पूर्ण रोक लगा रखी थी। हालांकि, बढ़ते वैश्विक और क्षेत्रीय तनावों के कारण हाल के वर्षों में कुछ छोटे बदलाव किए गए थे, लेकिन तब निर्यात केवल पांच विशिष्ट क्षेत्रों तक ही सीमित था: बचाव, परिवहन, चेतावनी, निगरानी और बारूदी सुरंगों को हटाना। नई गाइडलाइन ने इन सभी सीमाओं को समाप्त कर दिया है। अब जापान लड़ाकू विमान, मिसाइल और विध्वंसक (Destroyers) जैसे घातक उपकरणों का निर्यात कर सकेगा। हालांकि, यह निर्यात केवल उन 17 देशों तक सीमित रहेगा जिन्होंने जापान के साथ रक्षा उपकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

घरेलू रक्षा उद्योग और अंतरराष्ट्रीय समझौते

जापान का घरेलू रक्षा उद्योग लंबे समय से केवल 'सेल्फ-डिफेंस फोर्स' और रक्षा मंत्रालय की जरूरतों तक सीमित रहने के कारण एक कमजोर निवेश माना जाता रहा है। लेकिन अब चीन, उत्तरी कोरिया और रूस से मिल रही चुनौतियों के कारण स्थिति बदल रही है। जापान अपनी सेना और रक्षा उद्योग को तेजी से आधुनिक बना रहा है। इसी क्रम में ऑस्ट्रेलिया ने जापान के साथ एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते के तहत, मित्सुबिशी हेवी इंडस्ट्रीज द्वारा अपग्रेड किए गए 'मोगामी-क्लास' के तीन फ्रिगेट ऑस्ट्रेलिया को दिए जाएंगे, जबकि आठ अन्य फ्रिगेट का निर्माण दोनों देश मिलकर करेंगे।

प्रमुख बिंदु और भविष्य की संभावनाएं

पिछले हफ्ते नाटो (NATO) के 30 प्रतिनिधियों के एक समूह ने जापान का दौरा किया था, जिसका उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच रक्षा संबंधों को और प्रगाढ़ करना था। इस समूह ने मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक कॉर्प की उस सहायक कंपनी का भी निरीक्षण किया जो तीन देशों के साझा लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट का हिस्सा है और अपनी उन्नत सैटेलाइट तकनीक के लिए जानी जाती है।

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