जोधपुर नगर निगम चुनाव: अशोक गहलोत के वार्ड में बीजेपी की सेंध, दिग्गजों के किलों में बड़ा उलटफेर

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जोधपुर नगर निगम चुनाव: अशोक गहलोत के वार्ड में बीजेपी की सेंध, दिग्गजों के किलों में बड़ा उलटफेर
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जोधपुर नगर निगम चुनाव के हालिया नतीजों ने राजस्थान की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। इन चुनाव परिणामों ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राज्य स्तर के दिग्गज नेताओं के राजनीतिक प्रभाव पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। जोधपुर, जो पारंपरिक रूप से बड़े नेताओं का गढ़ माना जाता रहा है, वहां इस बार मतदाताओं ने कई चौंकाने वाले फैसले सुनाए हैं और सबसे बड़ी चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के प्रभाव वाले क्षेत्र की हो रही है, जहां भारतीय जनता पार्टी ने उनके खुद के वार्ड में जीत हासिल कर कांग्रेस को एक बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक झटका दिया है।

अशोक गहलोत के वार्ड में बीजेपी की बड़ी जीत

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिए यह चुनाव परिणाम व्यक्तिगत रूप से भी काफी निराशाजनक रहे हैं और जिस वार्ड में उन्होंने खुद अपने मताधिकार का प्रयोग किया था, वहां कांग्रेस की हार और बीजेपी की जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। इस वार्ड में बीजेपी के प्रत्याशी ने जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया कि सत्ता विरोधी लहर या स्थानीय समीकरणों ने दिग्गज नेताओं के प्रभाव को भी पीछे छोड़ दिया है। यह हार कांग्रेस के लिए इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके सबसे बड़े चेहरे के घर में हुई सेंधमारी है।

गहलोत परिवार के करीबी जसवंत सिंह कच्छवाह को लगा झटका

कांग्रेस के लिए झटकों का सिलसिला यहीं नहीं रुका और गहलोत परिवार से करीबी तौर पर जुड़े जसवंत सिंह कच्छवाह को भी इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है। बीजेपी के विजय सिंह ने एकतरफा मुकाबले में जसवंत सिंह कच्छवाह को 1000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी। इतने बड़े अंतर से हुई यह हार क्षेत्र में बदलते राजनीतिक मिजाज को साफ तौर पर दर्शाती है। विजय सिंह की इस जीत ने बीजेपी कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भर दिया है।

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की हार

जोधपुर नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के कई अन्य बड़े चेहरों को भी हार का स्वाद चखना पड़ा। पूर्व मेयर कुंती देवड़ा, जिनका शहर की राजनीति में काफी दबदबा माना जाता था, उन्हें बीजेपी की निकिता ने 259 वोटों के अंतर से हरा दिया। इसके अलावा, कांग्रेस के जिलाध्यक्ष ओंकार वर्मा को भी अपनी सीट बचाने में कामयाबी नहीं मिली। उन्हें बीजेपी के मेघराज लोहिया ने चुनावी मैदान में मात दी। इन हारों ने कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और स्थानीय रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

बीजेपी को भी लगा एक बड़ा झटका

हालांकि, यह चुनाव पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में ही नहीं रहा। बीजेपी को भी एक बहुत बड़ा झटका तब लगा जब उनके मेयर पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे कुमार देवेंद्र चुनाव हार गए और कुमार देवेंद्र को कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष नरेश जोशी ने पराजित किया। मेयर पद की दौड़ में शामिल एक प्रमुख चेहरे की हार ने बीजेपी की रणनीतियों को भी प्रभावित किया है और कांग्रेस को जश्न मनाने का एक बड़ा मौका दिया है।

गजेंद्र सिंह शेखावत के गढ़ में भी बदले समीकरण

अशोक गहलोत के बाद, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी चुनावी समीकरण बदलते हुए नजर आए। शेखावत के वार्ड में बीजेपी की प्रत्याशी भावना रूप को कांग्रेस की पुष्पा गहलोत ने हरा दिया और केंद्रीय मंत्री के अपने क्षेत्र में बीजेपी की यह हार पार्टी के लिए आत्ममंथन का विषय बन गई है। यह दर्शाता है कि मतदाताओं ने पार्टी के बड़े चेहरों के बजाय स्थानीय उम्मीदवारों और उनके कार्यों को अधिक महत्व दिया है।

शेखावत के करीबी रविंद्र सिंह मामडोली की हार

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के करीबी माने जाने वाले रविंद्र सिंह मामडोली को भी इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उन्हें कांग्रेस के गिरधारी सिंह ने 800 से अधिक वोटों के अंतर से शिकस्त दी। मामडोली की हार बीजेपी के लिए एक बड़ा व्यक्तिगत झटका मानी जा रही है, क्योंकि वे शेखावत के बेहद विश्वसनीय साथियों में गिने जाते थे और गिरधारी सिंह की इस जीत ने कांग्रेस को शेखावत के गढ़ में मजबूती प्रदान की है।

भविष्य की राजनीति के लिए नए संकेत

जोधपुर नगर निगम के इन नतीजों को कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर दिग्गज नेताओं के प्रभाव वाले वार्डों में हुए इस बड़े उलटफेर ने आने वाले समय में शहर की राजनीति में नए समीकरणों के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में जोधपुर नगर निगम चुनाव की यह गूंज निश्चित रूप से सुनाई देगी। दोनों ही पार्टियों को अब अपनी जमीनी पकड़ मजबूत करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी, क्योंकि मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल बड़े नाम के सहारे चुनाव जीतना मुमकिन नहीं होगा।

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