जस्टिस यशवंत वर्मा मामला: क्या दर्ज होगी FIR या चलेगा महाभियोग? जानें विशेषज्ञों की राय

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जस्टिस यशवंत वर्मा मामला: क्या दर्ज होगी FIR या चलेगा महाभियोग? जानें विशेषज्ञों की राय
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आने वाले समय में प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है, क्योंकि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित एक उच्च स्तरीय जांच समिति ने उन्हें उनके सरकारी आवास से नकदी मिलने के मामले में दोषी पाया है। पिछले साल हुए इस खुलासे के बाद अब कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गई है कि क्या उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया जारी रहेगी या फिर सीधे आपराधिक मामला दर्ज किया जाएगा।

जांच समिति की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी गई जांच समिति की रिपोर्ट में जस्टिस यशवंत वर्मा की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जब वह दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे, तब उनके आधिकारिक आवास के स्टोर रूम में भारी मात्रा में नकदी मिली थी। समिति ने अपनी जांच में पाया कि जस्टिस वर्मा इस नकदी की मौजूदगी, इसके स्रोत या इसके स्वामित्व के संबंध में कोई भी संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में पूरी तरह विफल रहे। इसी आधार पर समिति ने उन्हें आरोपों का दोषी माना है।

महाभियोग और इस्तीफे पर विशेषज्ञों का रुख

वरिष्ठ वकील और संविधान विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने इस कानूनी स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले याचिकाओं को खारिज किए जाने का वर्तमान स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब चूंकि रिपोर्ट संसद के पटल पर आ चुकी है और जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, इसलिए उन्हें पद से हटाने का प्रश्न ही नहीं उठता। द्विवेदी की राय में महाभियोग प्रस्ताव अब निष्प्रभावी हो गया है, लेकिन समिति की रिपोर्ट के आधार पर निश्चित रूप से प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील विकास सिंह का मानना है कि यदि जस्टिस वर्मा का इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है, तो उनके खिलाफ महाभियोग चलाया जा सकता है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बिंदु की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस्तीफा देने की स्थिति में जस्टिस वर्मा को पेंशन पाने का अधिकार होगा, लेकिन यदि उन्हें महाभियोग के माध्यम से हटाया जाता है, तो वह पेंशन संबंधी सभी लाभों से वंचित हो जाएंगे। सिंह ने यह भी कहा कि यदि जांच समिति ने प्राथमिकी की सिफारिश की है, तो वह अवश्य दर्ज की जानी चाहिए।

संवैधानिक अधिकार क्षेत्र और न्यायिक संरक्षण

संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने इस मामले में एक अलग कानूनी पहलू रखा है। उनका कहना है कि जस्टिस वर्मा द्वारा पद से इस्तीफा दे देने के बाद अब महाभियोग का कोई औचित्य नहीं रह गया है क्योंकि संसद का अधिकार क्षेत्र अब समाप्त हो चुका है। जहां तक प्राथमिकी (FIR) का सवाल है, धवन ने स्पष्ट किया कि संसदीय कार्यवाही इसमें कोई बाधा नहीं डालती। उन्होंने बताया कि जब वह न्यायाधीश के पद पर थे, तब उन्हें विशेष संरक्षण प्राप्त था और प्राथमिकी के लिए भारत के प्रधान न्यायाधीश की अनुमति अनिवार्य थी, लेकिन अब वह संरक्षण समाप्त हो चुका है। उन्होंने इस मामले में केवल आपराधिक कार्रवाई के जरिए ही उचित जांच की संभावना जताई है।

विपरीत विचार और गहन जांच की मांग

वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने इस मामले में थोड़ी अलग राय व्यक्त की है। उन्हें नहीं लगता कि केवल समिति की रिपोर्ट के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करना उचित होगा और उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा लगता है जैसे समिति ने सारा बोझ जस्टिस वर्मा पर डाल दिया है कि वह पैसे का स्रोत बताएं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि लुटियंस दिल्ली के बड़े बंगलों में रहने वाले सभी लोगों से उनके परिसर में मिली हर वस्तु का हिसाब मांगा जाए, तो सैकड़ों प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ सकती हैं।

इसके विपरीत, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल तिवारी ने कहा कि अब जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का सही समय है। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायाधीशों को मिलने वाला संरक्षण उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिए है, न कि घर में बड़ी मात्रा में नकदी रखने के लिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अब कानून मंत्रालय को इस मामले में पहल करनी चाहिए और इसी तरह वकील अनिल सोनी ने भी कहा कि चूंकि जस्टिस वर्मा अब न्यायाधीश नहीं हैं, इसलिए उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर मामले की गहन जांच की जानी चाहिए।

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