कर्नाटक मंत्री बी नागेंद्र का इस्तीफा: वाल्मीकि निगम घोटाले में दूसरी बार छोड़ा पद

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कर्नाटक मंत्री बी नागेंद्र का इस्तीफा: वाल्मीकि निगम घोटाले में दूसरी बार छोड़ा पद
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कर्नाटक की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जहां मंत्री बी नागेंद्र ने शुक्रवार 28 अगस्त को अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी है। महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में हुए कथित घोटाले को लेकर उन पर लग रहे आरोपों के बीच यह उनका दूसरा इस्तीफा है। नागेंद्र ने मंत्री पद संभालने के महज 25 दिन बाद ही कैबिनेट छोड़ने का फैसला लिया है। उन पर 187 करोड़ रुपये के गबन और वित्तीय अनियमितताओं में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं।

भावुक हुए नागेंद्र और मनुवादी विचारधारा पर साधा निशाना

शुक्रवार को विधान सौधा में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बी नागेंद्र काफी भावुक नजर आए और उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को सौंप दिया है। नागेंद्र ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि विपक्षी दलों द्वारा उन पर लगाए गए अनावश्यक आरोपों के कारण उनकी पार्टी को जो शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है, उससे बचने के लिए वह अपनी मर्जी से इस्तीफा दे रहे हैं। उन्होंने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि मनुवादी लोग नहीं चाहते थे कि देश में कोई आदिवासी व्यक्ति आगे बढ़े और इसी वजह से उन्हें निशाना बनाया गया है।

विपक्ष का भारी दबाव और पदयात्रा का ऐलान

बी नागेंद्र के इस्तीफे के पीछे बीजेपी और जेडीएस का लगातार बढ़ता दबाव एक बड़ी वजह माना जा रहा है। विपक्षी दलों ने इस कथित घोटाले के विरोध में 1 से 10 सितंबर तक रायचूर से बल्लारी तक एक बड़ी पदयात्रा निकालने की योजना बनाई थी। विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान भी विपक्ष ने सदन के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर जमकर हंगामा किया था। लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण कर्नाटक विधानसभा का मानसून सत्र निर्धारित समय से तीन दिन पहले ही 24 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था।

एक घोटाला और दो बार इस्तीफे की कहानी

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि नागेंद्र ने एक ही घोटाले के आरोपों के चलते दूसरी बार इस्तीफा दिया है। इससे पहले जून 2024 में जब यह विवाद पहली बार सामने आया था, तब उन्होंने तत्कालीन सिद्धारमैया सरकार में जनजातीय कल्याण विभाग के मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। हालांकि, 3 अगस्त 2026 को उन्हें दोबारा डीके शिवकुमार की कैबिनेट में शामिल किया गया और उन्हें योजना और सांख्यिकी विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके दोबारा मंत्री बनते ही विपक्ष ने फिर से मोर्चा खोल दिया और अंततः उन्हें 28 अगस्त को फिर से पद छोड़ना पड़ा।

क्या है 187 करोड़ रुपये का वाल्मीकि निगम घोटाला?

इस पूरे विवाद की जड़ महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम है, जो राज्य सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में आता है। आरोप है कि निगम के बैंक खाते से लगभग 187 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि बिना किसी आधिकारिक अनुमति के ट्रांसफर की गई थी। इस घोटाले का खुलासा मई 2024 में तब हुआ जब निगम के अकाउंट्स ऑफिसर चंद्रशेखर पी ने आत्महत्या कर ली। चंद्रशेखर ने अपने सुसाइड नोट में आरोप लगाया था कि निगम के 187 करोड़ रुपये अनाधिकृत रूप से बैंक खाते से स्थानांतरित किए गए थे।

सीबीआई और ईडी की जांच का दायरा

जांच में यह बात सामने आई कि इस राशि में से लगभग 88 करोड़ 62 लाख रुपये विभिन्न खातों में भेजे गए थे। इन खातों में कुछ प्रमुख आईटी कंपनियां और हैदराबाद स्थित एक सहकारी बैंक के खाते भी शामिल थे और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की और जांच शुरू की। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में नागेंद्र को आरोपी बनाया है और उन पर अवैध लाभ लेने का आरोप लगाया है। इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने भी उन्हें गिरफ्तार किया था, हालांकि वह फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। नागेंद्र ने दावा किया कि सीएम शिवकुमार ने उन्हें इस्तीफा न देने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने सरकार की छवि बचाने के लिए खुद यह कदम उठाया है।

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