ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। इस भू-राजनीतिक संकट के कारण दुनिया भर में एलपीजी (LPG) समेत अन्य महत्वपूर्ण ईंधनों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी के हालिया बयानों के अनुसार, सरकार विभिन्न वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग की संभावनाओं पर विचार कर रही है। इन विकल्पों में बायोमास, आरडीएफ (RDF) पेललेट, कोयला और केरोसिन शामिल हैं। विशेष रूप से केरोसिन की वापसी को लेकर चर्चाएं तेज हैं, क्योंकि यह कभी भारतीय रसोई का प्राथमिक ईंधन हुआ करता था।
ऐतिहासिक रूप से केरोसिन या मिट्टी का तेल भारत के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ऊर्जा का एक अनिवार्य स्रोत रहा है। फणीश्वरनाथ रेणु जैसे साहित्यकारों की रचनाओं में भी इसका उल्लेख मिलता है, जो इसके सामाजिक महत्व को दर्शाता है। एक समय था जब सरकारी राशन की दुकानों (PDS) के माध्यम से रियायती दरों पर केरोसिन का वितरण किया जाता था, जिसका उपयोग खाना पकाने के लिए स्टोव और रोशनी के लिए लालटेन में होता था। हालांकि, पिछले एक दशक में ऊर्जा नीतियों में आए बदलावों के कारण इसकी उपलब्धता और उपयोग में भारी कमी आई है।
केरोसिन के उपभोग में गिरावट के सांख्यिकीय आंकड़े
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी 'Energy Statistics India 2024' रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मिट्टी के तेल की खपत में पिछले एक दशक में नाटकीय गिरावट देखी गई है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2013-14 से 2022-23 के बीच केरोसिन की खपत में औसतन 26% की वार्षिक गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट सरकार की उस नीति का परिणाम है जिसके तहत स्वच्छ ईंधन को प्राथमिकता दी गई। रिपोर्ट बताती है कि जहां पहले केरोसिन का उपयोग व्यापक था, वहीं अब यह केवल कुछ विशिष्ट क्षेत्रों या औद्योगिक उपयोगों तक ही सीमित रह गया है।
स्वच्छ ऊर्जा और एलपीजी का विस्तार
केरोसिन के रसोई से बाहर होने का सबसे बड़ा कारण प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी पहल रही है। सरकार ने पर्यावरण और स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लकड़ी और केरोसिन जैसे ईंधनों के स्थान पर एलपीजी सिलेंडरों के उपयोग को बढ़ावा दिया। केरोसिन के जलने से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और घर के भीतर वायु प्रदूषण ने नीति निर्माताओं को स्वच्छ विकल्पों की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। जैसे-जैसे एलपीजी की पहुंच बढ़ी, केरोसिन पर निर्भरता स्वतः ही कम होती गई।
ग्रामीण विद्युतीकरण और तकनीकी विकल्प
रोशनी के स्रोत के रूप में केरोसिन के उपयोग में कमी आने का मुख्य कारण सौभाग्य योजना और अन्य ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम रहे हैं। गांवों में बिजली पहुंचने के बाद लालटेन और पेट्रोमैक्स की जगह एलईडी बल्बों और ट्यूबलाइटों ने ले ली। इसके अतिरिक्त, सौर ऊर्जा के क्षेत्र में हुई प्रगति और बाजार में सस्ते सोलर लैंप तथा इमरजेंसी लाइटों की उपलब्धता ने केरोसिन की आवश्यकता को लगभग समाप्त कर दिया। इन तकनीकी विकल्पों ने न केवल लागत कम की बल्कि ऊर्जा दक्षता में भी सुधार किया।
सब्सिडी नीति में बदलाव और बाजार मूल्य
वर्ष 2019 में सरकार ने केरोसिन पर दी जाने वाली सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही कई राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत केरोसिन की बिक्री बंद कर दी गई। सब्सिडी हटने के बाद खुले बाजार में केरोसिन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के अनुरूप हो गईं, जिससे यह आम उपभोक्ता के लिए महंगा हो गया। आर्थिक रूप से अव्यवहारिक होने के कारण उपभोक्ताओं ने इसे पूरी तरह से त्याग दिया। हालांकि, वर्तमान में एलपीजी की वैश्विक कीमतों में उछाल और आपूर्ति की कमी को देखते हुए, इसे एक अस्थायी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
रिफाइनिंग प्रक्रिया और औद्योगिक उपयोग
केरोसिन का उत्पादन कच्चे तेल (Crude Oil) के प्रभाजी आसवन (Fractional Distillation) के माध्यम से किया जाता है। रिफाइनरी में कच्चे तेल को विभिन्न तापमानों पर गर्म किया जाता है, जिससे पेट्रोल, डीजल और केरोसिन जैसे उत्पाद अलग-अलग स्तरों पर प्राप्त होते हैं। केरोसिन का क्वथनांक पेट्रोल और डीजल के बीच होता है। घरेलू उपयोग के अलावा, केरोसिन का परिष्कृत रूप एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) के मुख्य घटक के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, यह औद्योगिक बर्नर, सॉल्वैंट्स और कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं में एक महत्वपूर्ण कच्चे माल के रूप में कार्य करता है।