ECI SIR Process: ममता बनर्जी का चुनाव आयोग पर 'उद्दंडता' का आरोप, SIR प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

ECI SIR Process - ममता बनर्जी का चुनाव आयोग पर 'उद्दंडता' का आरोप, SIR प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल
| Updated on: 10-Jan-2026 06:09 PM IST
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एक कड़ा पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया पर गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं. मुख्यमंत्री ने इस प्रक्रिया को 'असंवेदनशील' और 'अमानवीय' करार दिया है, और आरोप लगाया है कि यह लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर रही है. उन्होंने इस पूरी कवायद को 'खुली उद्दंडता' बताया है, जो एक संवैधानिक संस्था के लिए चिंताजनक है.

अमानवीय प्रक्रिया और उसके परिणाम

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने पत्र में इस बात पर गहरा आघात और चिंता व्यक्त की है कि निर्वाचन आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया आम नागरिकों को लगातार परेशान कर रही है. उन्होंने कहा कि सुनवाई की यह प्रक्रिया पूरी तरह से तकनीकी और यांत्रिक हो गई है, जिसमें मानवीय दृष्टिकोण, संवेदनशीलता और समझ की कमी साफ झलकती है. यह प्रक्रिया, जो वास्तव में सकारात्मक और उपयोगी होनी चाहिए थी, अब तक 77 लोगों की मौत, 4 आत्महत्या के प्रयास और 17 लोगों के बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होने का कारण बन चुकी है. इन गंभीर आंकड़ों ने इस प्रक्रिया की अमानवीय प्रकृति को उजागर किया है, जिससे नागरिकों में डर और निराशा फैल रही है.

प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी नहीं बख्शा गया

सीएम ममता बनर्जी ने अपने पत्र में कई ऐसे उदाहरणों का उल्लेख किया. है, जहां प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी इस असंवेदनशील प्रक्रिया का सामना करना पड़ा है. उन्होंने बताया कि 90 वर्ष से अधिक उम्र के नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमर्त्य सेन जैसे सम्मानित विद्वान से भी अपनी पहचान साबित करने को कहा गया. यह घटना विशेष रूप से निंदनीय है, क्योंकि यह दर्शाता है कि प्रक्रिया में मानवीय विवेक का कितना अभाव है. इसी तरह, प्रसिद्ध कवि जॉय गोस्वामी, सांसद और अभिनेता दीपक अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी और भारत सेवाश्रम संघ के महाराज जैसे सार्वजनिक हस्तियों को भी इसी तरह की परेशानी से गुजरना पड़ा है. ये उदाहरण इस बात पर जोर देते हैं कि यह समस्या केवल आम नागरिकों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को प्रभावित कर रही है.

सामाजिक संवेदनशीलता की कमी और महिलाओं का अपमान

मुख्यमंत्री ने ईसीआई पर सामाजिक संवेदनशीलता की कमी का भी आरोप लगाया है और उन्होंने विशेष रूप से उन महिला मतदाताओं का मुद्दा उठाया है, जिन्हें शादी के बाद ससुराल जाकर उपनाम बदलने के बावजूद अपनी पहचान साबित करने के लिए बुलाया जा रहा है. ममता बनर्जी ने इसे महिलाओं और असली मतदाताओं का अपमान बताया है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक संवैधानिक संस्था आधी आबादी (महिलाओं) के साथ ऐसा व्यवहार करती है और यह दर्शाता है कि प्रक्रिया में लैंगिक संवेदनशीलता का भी अभाव है, जिससे महिला मतदाताओं को अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर सवाल उठ रहे हैं.

अप्रशिक्षित ऑब्ज़र्वर और उनके अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन

पत्र में यह भी बताया गया है कि चुनाव आयोग द्वारा ऑब्ज़र्वर और माइक्रो-ऑब्ज़र्वर को बिना किसी उचित प्रशिक्षण के विशेष और संवेदनशील कार्यों के लिए नियुक्त किया जा रहा है. इन ऑब्ज़र्वर में से कई अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहे हैं, जिससे नागरिकों के बीच और अधिक भ्रम और परेशानी पैदा हो रही है. मुख्यमंत्री ने ऐसी परेशान करने वाली रिपोर्ट्स का भी जिक्र किया है कि कुछ ऑब्ज़र्वर आम नागरिकों को 'देशद्रोही' बता रहे हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं. यह व्यवहार न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि नागरिकों के सम्मान और अधिकारों का सीधा उल्लंघन भी है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं.

सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल और राजनीतिक पक्षपात के आरोप

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर राज्य से इन तथाकथित ऑब्ज़र्वर को सुरक्षा प्रदान करने की उम्मीद करने का भी आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब पुलिस बल गंगासागर मेले के लिए भारी संख्या में तैनात है, उसका मुख्य कर्तव्य आम नागरिकों की रक्षा करना है, न कि इन ऑब्ज़र्वर को सुरक्षा देना. यह स्थिति राज्य के संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डालती है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्राथमिकताओं को बाधित करती है. इसके अतिरिक्त, मुख्यमंत्री ने यह भी आरोप लगाया है कि तथाकथित 'लॉजिकल गड़बड़ियों' को, जो वास्तव में 'इलॉजिकल' हैं, कुछ ही निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक पक्षपात के साथ जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है. यह आरोप चुनाव आयोग की निष्पक्षता और तटस्थता पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का विश्वास कम हो सकता है.

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