पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान के साथ जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली किसी भी बड़ी वृद्धि का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है और हालिया आंकड़ों के अनुसार, 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमलों के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों को 73 डॉलर से बढ़ाकर लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा दिया है। शुक्रवार को कारोबारी सत्र के दौरान ब्रेंट क्रूड के दाम 94 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर गए।
महंगाई दर पर संभावित प्रभाव
3 फीसदी के आसपास रह सकती है। 20 फीसदी का इजाफा हो सकता है। 50 फीसदी से अधिक हो सकता है, बशर्ते उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में कोई बदलाव न किया जाए। 10 फीसदी तक बढ़ा सकती हैं।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और ईंधन का भार
भारत में नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) श्रृंखला के तहत पेट्रोल और डीजल की संवेदनशीलता बढ़ गई है और 8 फीसदी हो गया है। इसका अर्थ यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में होने वाला कोई भी बदलाव अब घरेलू महंगाई के आंकड़ों को पहले की तुलना में अधिक प्रभावित करेगा। 22 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई थी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती हैं, तो सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ सकती है।
आयात निर्भरता और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियां
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 फीसदी से अधिक हिस्सा आयात करता है। डीबीएस बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट राधिका राव के अनुसार, भारत के कुल तेल आयात का लगभग आधा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है, जो वर्तमान में तनाव का केंद्र बना हुआ है और वित्त वर्ष 2026 के पहले दस महीनों के आंकड़ों के अनुसार, भारत ने अपनी आपूर्ति का लगभग 47 फीसदी हिस्सा सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और इराक जैसे मध्य पूर्वी देशों से प्राप्त किया है। आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की बाधा भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिम पैदा कर सकती है।
जीडीपी विकास दर और चालू खाता घाटा
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें न केवल महंगाई बढ़ाती हैं, बल्कि आर्थिक विकास की गति को भी धीमा कर सकती हैं। 15 फीसदी की कमी आ सकती है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस के अनुसार, लंबे समय तक तनाव रहने से आपूर्ति में रुकावट के कारण विकास दर 20-30 बेसिस पॉइंट तक कम हो सकती है। इसके अतिरिक्त, चालू खाता घाटा (CAD) भी बढ़ने की आशंका है। 8 फीसदी तक पहुंच सकता है।
वैश्विक परिदृश्य और आर्थिक अनुमान
8 फीसदी रह सकता है। 4 फीसदी तक बढ़ा देती है। जेपी मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च की रिपोर्ट बताती है कि ऊर्जा की ऊंची कीमतें वैश्विक स्तर पर महंगाई को बढ़ावा देंगी, जिससे 2026 की पहली छमाही में वैश्विक सीपीआई दर में 1 फीसदी से अधिक की वृद्धि हो सकती है। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेनगुप्ता के अनुसार, फिलहाल रिटेल कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना कम है, जिससे उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इसका बोझ तेल विपणन कंपनियों के मार्जिन पर पड़ेगा।