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कूटनीति बनाम जंग: क्या अमेरिका ईरान समझौता बेंजामिन नेतन्याहू के लिए बनेगा बड़ी मुसीबत?

कूटनीति बनाम जंग: क्या अमेरिका ईरान समझौता बेंजामिन नेतन्याहू के लिए बनेगा बड़ी मुसीबत?
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मिडिल ईस्ट में इस समय कूटनीति और युद्ध की संभावनाओं के बीच एक अजीब सी खींचतान देखने को मिल रही है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क बढ़ने की खबरें आ रही हैं और यह उम्मीद जताई जा रही है कि दोनों देश टकराव की जगह बातचीत का रास्ता चुन सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जमीन पर हालात भी यही कहानी बयां कर रहे हैं? हालिया घटनाओं पर नजर डालें तो तस्वीर कूटनीतिक बयानों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। अविश्वास की गहरी खाई और सैन्य तैयारियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि शांति का दावा अभी भी हकीकत से कोसों दूर है।

जमीनी हकीकत और सैन्य तनाव

होर्मुज के आसपास से लगातार वॉर्निंग शॉट्स की खबरें सामने आ रही हैं, जो क्षेत्र में तनाव की गंभीरता को दर्शाती हैं। ईरान की तरफ से होने वाली ड्रोन गतिविधियां भी अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी हुई हैं। फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का लगातार बना रहना और केश्म-सिरिक तट के आसपास की घटनाएं यह साफ संकेत देती हैं कि क्षेत्र अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा विरोधाभास है कि एक तरफ बातचीत की मेज सजी हुई है, तो दूसरी तरफ सुरक्षा और सैन्य तैयारियां भी पूरी शिद्दत से जारी हैं। अगर दोनों पक्षों के बीच भरोसा होता, तो इतनी सैन्य सतर्कता की आवश्यकता नहीं पड़ती और किसी भी समझौते की असली परीक्षा कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले भरोसे से होती है, जिसकी फिलहाल भारी कमी नजर आ रही है।

नेतन्याहू के लिए राजनीतिक चुनौतियां

अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई समझौता या डील हो जाती है, तो यह इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए बड़ी राजनीतिक मुश्किलों का सबब बन सकता है। इजराइल इस संभावित डील को अपनी सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखता है। नेतन्याहू के सामने कई कठिन सवाल खड़े हो सकते हैं। पहला सवाल यह होगा कि अगर अंत में समझौता ही करना था, तो इतने बड़े संघर्ष और युद्ध की क्या आवश्यकता थी? दूसरा, जिस ईरान को इजराइल ने हमेशा सबसे बड़ा खतरा बताया, अगर उसकी सत्ता और व्यवस्था इस समझौते के बाद भी बरकरार रहती है, तो इजराइल की जनता यह पूछ सकती है कि इतनी बड़ी कीमत चुकाने के बाद देश को हासिल क्या हुआ? तीसरा, इजराइल का विपक्ष इस स्थिति का फायदा उठाकर नेतन्याहू पर हमलावर हो सकता है कि वे ईरान को रोकने में विफल रहे और केवल एक नए संघर्ष को जन्म दिया।

गठबंधन और साख का संकट

नेतन्याहू के लिए चौथी चुनौती उनके अपने राजनीतिक सहयोगियों से आ सकती है। उनके गठबंधन में शामिल कट्टरपंथी खेमा किसी भी तरह के नरम समझौते को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है, जिससे उनकी सरकार के भीतर अस्थिरता पैदा हो सकती है। पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण सवाल नेतन्याहू की अपनी राजनीतिक साख पर उठ सकता है। अगर इस पूरी डील का श्रेय वाशिंगटन और डोनाल्ड ट्रंप ले जाते हैं और तेल अवीव केवल एक दर्शक बनकर रह जाता है, तो विरोधी यह नैरेटिव सेट कर सकते हैं कि फैसले अमेरिका ने लिए और नेतन्याहू को मजबूरी में उन्हें स्वीकार करना पड़ा। यही कारण है कि इस संभावित डील को नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य की एक बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।

परमाणु कार्यक्रम और मिसाइलों पर अटका पेंच

इस संभावित समझौते की राह में कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी बाधाएं हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर ठोस कदम उठाए और संवर्धित यूरेनियम के भंडार पर तत्काल नियंत्रण स्थापित किया जाए। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि उसका स्टॉक देश के भीतर ही रहेगा और वह पहले प्रतिबंधों और समुद्री दबाव से राहत चाहता है। इजराइल का तर्क है कि ईरान को मिलने वाला कोई भी आर्थिक लाभ भविष्य में उसकी सुरक्षा के लिए घातक साबित होगा और इसके अलावा, मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम पर भी गहरा टकराव है। अमेरिका इन पर निगरानी और प्रतिबंध चाहता है, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता का मुद्दा मानता है और इजराइल चाहता है कि ईरान की मिसाइल क्षमता पर और भी कड़े प्रतिबंध लगाए जाएं। इन अलग-अलग लाल रेखाओं के कारण बातचीत की मेज पर होने के बावजूद तीनों पक्षों के बीच सहमति बनना एक बड़ी चुनौती है।

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