SDM Poonam Choyal: नागौर में गोचर भूमि विवाद- SDM पूनम चायल के फैसले पर उठे सवाल, JK व्हाइट सीमेंट को फायदा पहुंचाने का आरोप

SDM Poonam Choyal - नागौर में गोचर भूमि विवाद- SDM पूनम चायल के फैसले पर उठे सवाल, JK व्हाइट सीमेंट को फायदा पहुंचाने का आरोप
| Updated on: 13-Jan-2026 06:45 PM IST
नागौर जिले में मेड़ता उपखंड में ग्राम धनापा की 10 हजार बीघा गोचर भूमि को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। मेड़ता की उपखंड अधिकारी (SDM) पूनम चायल ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिस पर जिला कलक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने गंभीर सवाल उठाए हैं और यह फैसला कथित तौर पर राजस्व नियमों का उल्लंघन करते हुए JK व्हाइट सीमेंट वर्क्स गोटन को सीधा फायदा पहुंचाने वाला प्रतीत होता है। कलक्टर ने इस निर्णय को SDM के 'अधिकार क्षेत्र से बाहर' और 'न्यायिक विवेक से रहित' करार दिया है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। यह प्रकरण एक बार फिर सरकारी भूमि पर निजी कंपनियों की बढ़ती नजर और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बहस को तेज कर रहा है, जहां सरकार से सख्त कार्यवाही की मांग उठ रही है।

क्या है पूरा मामला?

नागौर जिले के मेड़ता उपखंड में ग्राम धनापा की करीब 10 हजार बीघा गोचर भूमि को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। मेड़ता की उपखंड अधिकारी (SDM) पूनम चायल ने कथित तौर पर राजस्व नियमों का उल्लंघन करते हुए। एक फैसला सुनाया है, जो सीधे-सीधे JK व्हाइट सीमेंट वर्क्स गोटन को फायदा पहुंचाने वाला लगता है। जिला कलक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने इस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे 'अधिकार क्षेत्र से बाहर' और 'न्यायिक विवेक से रहित' करार दिया है और यह मामला सरकारी भूमि पर निजी कंपनियों के हितों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बहस छेड़ रहा है, जहां सरकार से सख्त कार्यवाही की मांग हो रही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह महज प्रशासनिक लापरवाही है या इसके पीछे बड़े हित छिपे हैं? और सरकार इस पूरे प्रकरण में कब सख्त कार्यवाही करेगी ये देखने वाली बात होगी।

42 साल पुराना नामांतरण और गोचर भूमि का महत्व

यह विवाद 1978-80 के दौरान दर्ज हुए एक नामांतरण (संख्या 411) से जुड़ा है। इस नामांतरण के तहत ग्राम धनापा की लगभग 10 हजार बीघा भूमि को 'गोचर' के रूप में दर्ज किया गया था। गोचर भूमि का ग्रामीण समुदायों के लिए अत्यधिक महत्व होता है, क्योंकि यह पशुधन के लिए चराई का मुख्य स्रोत होती है और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह भूमि सार्वजनिक संपत्ति होती है, जिसका उपयोग पूरे गांव के पशु करते हैं। यह भूमि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग होती। है, जो जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करती है। हालांकि, अक्सर देखा गया है कि निजी कंपनियां अपने व्यावसायिक हितों के लिए ऐसी महत्वपूर्ण सार्वजनिक भूमियों को हथियाने का प्रयास करती हैं, जिससे स्थानीय समुदायों और पर्यावरण को भारी नुकसान होता है।

JK सीमेंट की अपील और SDM का विवादास्पद फैसला

JK सीमेंट कंपनी ने इस 42 साल पुराने नामांतरण को चुनौती देते हुए मेड़ता SDM पूनम चायल की अदालत में एक अपील दायर की। इस अपील पर सुनवाई करते हुए, SDM पूनम चायल ने 10 नवंबर 2025 को एक फैसला सुनाया और इस फैसले में उन्होंने 1978-80 के नामांतरण को खारिज कर दिया और भूमि को 'मगरा' तथा 'पहाड़' के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने का आदेश दे दिया। यह निर्णय सीधे तौर पर कंपनी के पक्ष में जाता हुआ दिखाई देता है, क्योंकि 'मगरा' और 'पहाड़' के रूप में वर्गीकृत भूमि का उपयोग खनन जैसे व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, जबकि 'गोचर' भूमि का उपयोग केवल पशु चराई के लिए ही सीमित होता है। यह फैसला कंपनी के लिए खनन गतिविधियों को आसान बना सकता है, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ होगा।

राजस्व नियमों का उल्लंघन और उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना

SDM पूनम चायल का यह फैसला न केवल राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन करता है, बल्कि उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए कई महत्वपूर्ण फैसलों, जैसे 'गुलाब कोठारी बनाम राज्य सरकार' मामले में दिए गए निर्देशों की भी सीधी अवहेलना करता है। राजस्व नियमों के अनुसार, चारागाह या गोचर भूमि के वर्गीकरण में किसी भी। प्रकार का बदलाव करने का अधिकार केवल जिला कलक्टर के पास होता है। उपखंड अधिकारी के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है। इसके बावजूद, SDM पूनम चायल ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर इस महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया, जिससे उनकी मंशा पर गंभीर सवाल उठते हैं। यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक है जो कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी को दर्शाती है।

SDM पूनम चायल की भूमिका पर कलक्टर के तीखे सवाल

जिला कलक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने SDM पूनम चायल के इस फैसले पर तत्काल संज्ञान लिया और अपनी जांच रिपोर्ट में उनकी कार्यशैली पर पांच तीखे सवाल उठाए हैं और पहला सवाल यह है कि जब गोचर भूमि के वर्गीकरण बदलने का अधिकार केवल जिला कलक्टर के पास है, तो SDM पूनम चायल ने यह आदेश कैसे जारी किया? यह उनके अधिकार क्षेत्र का सीधा उल्लंघन है। दूसरा, 2023 में कलक्टर न्यायालय ने पहले ही इस मामले में फैसला सुना दिया था, फिर SDM ने इसे दोबारा क्यों सुनाया? एक ही मामले पर दो अलग-अलग अदालतों में सुनवाई और फैसला न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। तीसरा सवाल यह है कि अपील को एक बार वापस लेने के बाद, विपक्षी पक्ष को कोई नोटिस दिए बिना 9 महीने बाद इसे दोबारा कैसे बहाल किया गया? यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन है, जहां। दूसरे पक्ष को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। चौथा, मूल रिकॉर्ड उपलब्ध न होने पर केवल 'धारणा' के आधार? पर 42 साल पुराने नामांतरण को फर्जी कैसे मान लिया गया? किसी भी पुराने रिकॉर्ड को बिना ठोस सबूत के फर्जी करार देना गंभीर न्यायिक त्रुटि है और और पांचवां, बार-बार प्रार्थना पत्रों पर पक्षकारों के नाम जोड़ने-हटाने की अनुमति क्यों दी गई, जो कानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग प्रतीत होता है? ये सभी सवाल SDM की कार्यप्रणाली में गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा करते हैं।

कंपनी को फायदा पहुंचाने का आरोप और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी

कलक्टर द्वारा उठाए गए ये सवाल स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि SDM पूनम चायल ने इस पूरे प्रकरण में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी की है। कंपनी को खनन लीज का हस्तांतरण 1987, 2006 और 2015 में हुआ था,। जबकि भूमि उससे बहुत पहले ही गोचर के रूप में दर्ज हो चुकी थी। ऐसे में, कंपनी के पास पुराने नामांतरण को चुनौती देने का कोई विधिक आधार ही नहीं था और इसके बावजूद, SDM ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाने में अत्यधिक जल्दबाजी दिखाई। यह स्थिति गंभीर संदेह पैदा करती है कि क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है, या इसके पीछे निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने का कोई बड़ा खेल है, जिसमें सरकारी भूमि को भी नहीं बख्शा गया और यह प्रकरण राजस्थान में गोचर भूमि पर बढ़ते खतरे को उजागर करता है, जहां निजी हितों के लिए सार्वजनिक संसाधनों का दोहन हो रहा है।

जिला कलक्टर का त्वरित एक्शन और आगे की कार्यवाही

जिला कलक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने SDM के इस विवादास्पद फैसले पर तुरंत संज्ञान लिया और तहसीलदार मेड़ता को निर्देश दिए कि वे राजकीय अधिवक्ता के माध्यम से इस फैसले के खिलाफ अपील तैयार करें। उन्होंने SDM के फैसले पर 'स्थगन आदेश' (स्टे) प्राप्त करने के भी आदेश जारी किए हैं, ताकि भूमि के वर्गीकरण में किसी भी प्रकार के बदलाव को रोका जा सके। कलक्टर ने इस पूरे प्रकरण को 'प्रशासनिक लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण' और 'राज्य सरकार के हितों को कमजोर करने का प्रयास' बताया है और यह दर्शाता है कि जिला प्रशासन इस मामले की गंभीरता को समझता है और सरकारी संसाधनों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। यह कदम सरकारी भूमि के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

सरकारी भूमि पर बढ़ते खतरे और नीतिगत सवाल

यह मामला केवल एक उपखंड अधिकारी की कथित लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्थान सरकार की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है। यह उजागर करता है कि किस प्रकार निजी कंपनियों की नजरें सार्वजनिक और महत्वपूर्ण गोचर भूमियों पर गड़ी हुई हैं, और कैसे प्रशासनिक स्तर पर नियमों की अनदेखी कर उन्हें फायदा पहुंचाया जा सकता है। सरकार को गोचर भूमि जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों की रक्षा के लिए क्या ठोस और प्रभावी नीतियां बनानी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों को रोका जा सके? क्या SDM पूनम चायल पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी, या यह मामला केवल अपील और स्थगन तक ही सीमित रहेगा और इन सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिल पाएंगे, लेकिन यह प्रकरण सार्वजनिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करता है और सरकार से सख्त कार्यवाही की मांग करता है।

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