नेपाल के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से तिब्बत सीमा से सटे इलाकों में अचानक आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। इस प्राकृतिक आपदा में अब तक 162 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं और मरने वालों की संख्या में और बढ़ोतरी होने की गंभीर आशंका जताई जा रही है। बुधवार सुबह आई इस आपदा ने रसुवा इलाके में भोटेकोशी नदी के आसपास के घरों, सड़कों और पुलों को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। इस जल प्रलय के कारण अब तक 750 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक और भारतीय तीर्थयात्री शामिल हैं।
तबाही का मंजर और जान-माल का नुकसान
नेपाल पुलिस द्वारा जारी बुलेटिन के अनुसार, गुरुवार सुबह 5 बजे तक 8 अलग-अलग जिलों से 162 शव निकाले गए हैं। तिब्बत सीमा के पास मध्य नेपाल के जिलों में आई इस बाढ़ ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। चीन के सरकारी मीडिया ने भी जानकारी दी है कि तिब्बत में 3 लोगों की मौत हुई है और 265 लोग लापता हैं। सीमा पर लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज में पानी और कीचड़ की एक विशाल लहर को इमारतों से टकराते हुए देखा गया है, जो इस आपदा की भयावहता को दर्शाता है। नेपाल में दर्जनों पुलिस अधिकारी, सेना के जवान और बिजली विभाग के कर्मचारी भी लापता हैं। इसके अलावा, कम से कम एक दर्जन जलविद्युत परियोजनाएं इस बाढ़ की चपेट में आकर क्षतिग्रस्त हो गई हैं।
भारतीय नागरिकों और तीर्थयात्रियों पर प्रभाव
इस आपदा में भारतीय नागरिकों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है और लापता होने वाले 750 लोगों में कम से कम 133 भारतीय और 37 अप्रवासी भारतीय (NRI) शामिल हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए कम से कम 50 भारतीय तीर्थयात्री भी लापता लोगों की सूची में हैं। ईशा फाउंडेशन ने जानकारी दी है कि उसके 77 सदस्य लापता हैं, जो एक आव्रजन केंद्र पर मौजूद थे। सम्राट टूर्स एंड ट्रैवल एजेंसी के अनुसार, पीड़ितों में 59 लोग ऐसे थे जो तीर्थयात्रा पर निकले थे। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कई लोग इस आपदा से प्रभावित हुए हैं। तमिलनाडु के 57 पर्यटकों में से 37 का अभी तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है, जबकि कोलकाता के 32 सदस्यों का एक समूह भी लापता बताया जा रहा है। संचार व्यवस्था ठप होने के कारण प्रभावितों के बारे में जानकारी जुटाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
विदेशी पर्यटकों की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
नेपाल का यह इलाका ट्रेकर्स और तीर्थयात्रियों के बीच बेहद लोकप्रिय है, इसलिए यहां बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक मौजूद थे। नेपाल टूरिस्ट बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, लापता पर्यटकों में अमेरिका के 54, ऑस्ट्रेलिया के 34 और इंग्लैंड के 33 नागरिक शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने 34 ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों के लापता होने की पुष्टि की है। वहीं, न्यूजीलैंड के विदेश मंत्रालय ने बताया है कि वे अपने नागरिकों के परिवारों के संपर्क में हैं और नेपाल सरकार से जानकारी जुटा रहे हैं। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने भी अपने 53 नागरिकों के लापता होने की सूचना दी है। हालांकि, अभी तक विदेशी नागरिकों के हताहत होने की आधिकारिक पुष्टि की प्रक्रिया जारी है।
भारत सरकार की पहल और हेल्पलाइन नंबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से फोन पर बात कर स्थिति का जायजा लिया और उन्हें हरसंभव मानवीय मदद का आश्वासन दिया। भारत ने राहत सामग्री की पहली खेप पहले ही रवाना कर दी है। काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने भारतीय नागरिकों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं। लोग +977 985 131 6807 या +977 970 910 7500 पर संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा, बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने भी हेल्पलाइन नंबर 0086 185 1428 4905 जारी किया है। नेपाल पर्यटन बोर्ड ने भी आपातकालीन नंबर 1234 और हॉटलाइन 1144 सक्रिय कर दिए हैं। नेपाल सेना के 8 ट्रकों के जरिए रसुवा इलाके में 8 टन राहत सामग्री भेजी गई है, जिसमें 500 मच्छरदानी, 500 कंबल, 500 सोलर लाइट, 500 सोलर पैनल और 220 स्लीपिंग बैग शामिल हैं।
बाढ़ का कारण और प्रभावित क्षेत्र
शुरुआत में इस आपदा का कारण भूकंप माना जा रहा था, लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने स्पष्ट किया कि यह ऊर्जा वास्तव में बड़े पैमाने पर हुए भूस्खलन के कारण पैदा हुई थी। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में बताया कि तिब्बत में सुबह 8 बजकर 37 मिनट पर आए भूकंप के झटकों के कारण संभवतः हिमनद फटा और उसके 3 मिनट बाद ही बाढ़ आ गई। भोटे कोशी नदी में पानी का स्तर अचानक बढ़ने से रसुवा और धादिंग जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। बाढ़ का पानी लेंडे नदी से होते हुए त्रिशूली नदी में पहुंचा और फिर नुवाकोट, चितवन, गोरखा, तनहुं और नवलपरासी पूर्व जैसे जिलों में फैल गया। यह तबाही राजधानी काठमांडू से 70 से 200 किलोमीटर तक के दायरे में फैली हुई है। विशेषज्ञ इस घटना को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि सटीक कारणों के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।