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US-China Tariff War: सिर्फ बिजनेस चौपट नहीं, चीन-अमेरिका हैं गंदगी फैलाने में भी आगे, भारत का रिकॉर्ड बेहतर

US-China Tariff War: सिर्फ बिजनेस चौपट नहीं, चीन-अमेरिका हैं गंदगी फैलाने में भी आगे, भारत का रिकॉर्ड बेहतर
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US-China Tariff War: अमेरिका और चीन के बीच चल रही टैरिफ वॉर एक बार फिर से दुनिया की नजरों में है। हाल ही में अमेरिका ने चीन पर 145 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगा दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव और अधिक गहरा गया है। इस टैरिफ गेम का असर सिर्फ अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गूंज पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था में महसूस की जा रही है।

टैरिफ युद्ध की वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मार

टैरिफ लगाने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक बाधाएं बढ़ रही हैं, जिससे न केवल आयात-निर्यात प्रभावित हो रहा है, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन भी अस्थिर हो गई है। अमेरिका की ओर से लगाए गए नए टैरिफ्स का उद्देश्य चीन को आर्थिक रूप से दबाव में लाना है, परंतु चीन भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। इन दोनों महाशक्तियों की यह रस्साकशी पूरी दुनिया के बाजारों में अनिश्चितता और महंगाई को जन्म दे रही है।

पर्यावरण पर अमेरिका और चीन की जिम्मेदारी

टैरिफ युद्ध के साथ-साथ एक और गंभीर मुद्दा सामने आया है – प्लास्टिक प्रदूषण। एक ताजा रिसर्च के अनुसार, 2022 में दुनिया भर में 268 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी चीन और अमेरिका की रही, जो न केवल सबसे अधिक प्लास्टिक का उत्पादन करते हैं, बल्कि सबसे ज्यादा कचरा भी फैलाते हैं।

प्लास्टिक उत्पादन और उपभोग

2022 में कुल 400 मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन हुआ। इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 42% और चीन की 32% थी। भारत की हिस्सेदारी मात्र 5% रही, जो उसकी जनसंख्या के अनुपात में काफी कम है। प्लास्टिक खपत के मामले में अमेरिका सबसे आगे रहा, जहां प्रति व्यक्ति 216 किलोग्राम प्लास्टिक का उपयोग हुआ। इसके मुकाबले भारत में यह संख्या बहुत ही कम रही।

प्लास्टिक कचरे का वैश्विक परिदृश्य

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने 81.5 मिलियन टन और अमेरिका ने 40.1 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न किया। यूरोपीय संघ और भारत क्रमशः 30 मिलियन और 9.5 मिलियन टन कचरे के साथ इस सूची में शामिल रहे। भारत, जो दुनिया की 17% आबादी का घर है, उसने केवल 6% प्लास्टिक का उपयोग किया और उसके कचरे की मात्रा भी तुलनात्मक रूप से काफी कम रही।

रिसाइकलिंग में भारत की स्थिति

रिसाइकलिंग की बात करें तो यूरोपीय संघ ने लगभग 20% प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल किया, जबकि अमेरिका सिर्फ 5% तक ही सीमित रहा। भारत ने इस दिशा में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है और अपने प्लास्टिक उपयोग और उत्पादन को नियंत्रित रखते हुए वैश्विक मानकों पर एक सकारात्मक उदाहरण पेश किया है।

साझा जिम्मेदारी की ज़रूरत

जहां अमेरिका और चीन आर्थिक प्रभुत्व के लिए टैरिफ युद्ध में उलझे हुए हैं, वहीं पर्यावरणीय जिम्मेदारी के मोर्चे पर भी उन्हें आत्मनिरीक्षण करने की ज़रूरत है। प्लास्टिक संकट आज एक वैश्विक समस्या बन चुका है, जिसका समाधान तभी संभव है जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अपनी जिम्मेदारी को समझें और ठोस कदम उठाएं। भारत की भूमिका हालांकि अब तक जिम्मेदार रही है, लेकिन बढ़ती जनसंख्या और औद्योगीकरण के चलते उसे भी सतर्क रहना होगा।

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