Operation Sindoor: अमेरिकी खुलासा- 'ऑपरेशन सिंदूर' से कांप उठा था पाकिस्तान, युद्ध रोकने के लिए 60 बार लगाई गुहार
Operation Sindoor - अमेरिकी खुलासा- 'ऑपरेशन सिंदूर' से कांप उठा था पाकिस्तान, युद्ध रोकने के लिए 60 बार लगाई गुहार
अमेरिकी फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत सार्वजनिक हुए दस्तावेजों ने पिछले साल अप्रैल में भारत द्वारा चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान की एक चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है और इन दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि इस सैन्य अभियान के चलते पाकिस्तान किस कदर घबरा गया था और उसने संघर्ष को रोकने के लिए अमेरिका में अपने राजनयिकों के माध्यम से किस तरह की गहन लॉबिंग की थी। यह रिपोर्ट न केवल पाकिस्तान की बेचैनी को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि भारत ने भी अमेरिकी प्रशासन के साथ अपने संपर्कों को मजबूत करने के लिए ऐसी ही लॉबिंग फर्मों की सेवाएं ली थीं। यह घटनाक्रम अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के पर्दे के पीछे चलने वाले जटिल खेल और संकट के समय में बाहरी शक्तियों। के प्रभाव को दर्शाता है, जहां दोनों देशों ने अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिकी गलियारों में सक्रियता दिखाई।
ऑपरेशन सिंदूर का पाकिस्तान पर गहरा प्रभाव
पिछले साल अप्रैल में जब भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' नामक सैन्य अभियान शुरू किया, तो इसका पाकिस्तान पर गहरा और तात्कालिक प्रभाव पड़ा। FARA के दस्तावेजों के अनुसार, पाकिस्तान इस सैन्य कार्रवाई से 'कांप गया था', जो उसकी आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरे का संकेत था और पाकिस्तान सरकार और उसके सैन्य प्रतिष्ठान ने इस स्थिति को अत्यंत चिंताजनक माना। उन्हें आशंका थी कि यह संघर्ष एक बड़े युद्ध में बदल सकता है, जिसके विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं, जिसमें जान-माल का भारी नुकसान और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव शामिल है। इस डर और अनिश्चितता के माहौल में, पाकिस्तान ने तुरंत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका से हस्तक्षेप की मांग की, ताकि इस बढ़ते तनाव को रोका जा सके और स्थिति को नियंत्रण में लाया जा सके। पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया उसकी सैन्य और कूटनीतिक तैयारियों पर ऑपरेशन सिंदूर के अप्रत्याशित प्रभाव को दर्शाती है।
अपनी घबराहट और युद्ध के संभावित परिणामों से बचने के लिए, पाकिस्तान ने अमेरिका में अपने राजनयिकों के माध्यम से एक अभूतपूर्व लॉबिंग अभियान चलाया। मीडिया रिपोर्ट्स और FARA दस्तावेजों के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिकी प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों, प्रभावशाली सांसदों, पेंटागन के वरिष्ठ अधिकारियों और विदेश विभाग के अफसरों के साथ लगभग 60 बार संपर्क किया। यह संपर्क ईमेल, फोन कॉल और आमने-सामने की बैठकों के माध्यम से किया गया था, जो पाकिस्तान की हताशा और संघर्ष को किसी भी कीमत पर रोकने की उसकी तीव्र इच्छा को दर्शाता है और इन संपर्कों का मुख्य उद्देश्य अमेरिका पर दबाव बनाना था ताकि वह भारत पर सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए दबाव डाले और एक तत्काल संघर्ष विराम सुनिश्चित करे। पाकिस्तान की ओर से यह एक बहु-आयामी दृष्टिकोण था, जिसमें विभिन्न अमेरिकी सरकारी विभागों और प्रभावशाली हस्तियों को शामिल किया गया था ताकि अधिकतम प्रभाव डाला जा सके।लॉबिंग का विस्तृत जाल और वित्तीय निवेश
पाकिस्तान ने अपनी लॉबिंग गतिविधियों को तेज करने के लिए भारी वित्तीय संसाधन भी खर्च किए और उसने ट्रम्प प्रशासन तक तेजी से पहुंच बनाने, व्यापार और कूटनीतिक फैसलों को प्रभावित करने के लिए 6 लॉबिंग फर्मों पर करीब ₹45 करोड़ (लगभग $5. 4 मिलियन) खर्च किए और यह एक महत्वपूर्ण निवेश था, जो दर्शाता है कि पाकिस्तान इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रहा था और वह अमेरिकी नीति को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था। इन फर्मों का काम अमेरिकी नीति निर्माताओं के साथ बैठकें आयोजित करना, पाकिस्तान के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना और संघर्ष विराम के लिए समर्थन जुटाना था। अमेरिकी लॉबिंग फर्म सिडेन लॉ एलएलपी की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि उसने पाकिस्तान को अमेरिका के साथ आर्थिक साझेदारी बढ़ाने और भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान समर्थन देने में मदद की थी, जिससे पाकिस्तान की बहुआयामी कूटनीतिक रणनीति का पता चलता है, जिसमें सैन्य तनाव के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक समर्थन जुटाना भी शामिल था।भारत की कूटनीतिक पहल और अमेरिकी फर्म की भूमिका
यह केवल पाकिस्तान ही नहीं था जो संकट के समय में अमेरिकी लॉबिंग फर्मों की सेवाएं ले रहा था। अमेरिकी लॉबिंग फर्म एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भारतीय दूतावास ने भी अमेरिकी सरकार और उसके अधिकारियों से संपर्क बढ़ाने के लिए उनकी सेवाएं ली थीं। यह दर्शाता है कि भारत भी इस संवेदनशील अवधि के दौरान अमेरिकी प्रशासन के साथ अपने संचार चैनलों को मजबूत करना चाहता था, ताकि अपने हितों की रक्षा की जा सके और अपनी स्थिति स्पष्ट की जा सके। एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच भारतीय दूतावास के लिए काम किया, जिसका उद्देश्य ट्रम्प प्रशासन के साथ कई अहम मुद्दों पर बातचीत में मदद करना था, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार संबंध और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताएं शामिल थीं। यह कदम भारत की सक्रिय कूटनीति का प्रमाण है, जो संकट के समय में भी अपने रणनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सभी उपलब्ध साधनों का उपयोग करता है।10 मई 2025: एक महत्वपूर्ण दिन
FARA में दी गई जानकारी के अनुसार, 10 मई को एसएचडब्ल्यू पार्टनर्स एलएलसी ने भारतीय दूतावास की ओर से व्हाइट हाउस चीफ ऑफ स्टाफ सूसी वाइल्स, अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर और नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के रिकी गिल से संपर्क कराने में मदद की। यह तारीख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन भारत और पाकिस्तान के बीच चला 4 दिन का सैन्य टकराव समाप्त हुआ था। इस दौरान भारत-अमेरिका व्यापार समझौते और ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी मीडिया कवरेज जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। फर्म की भूमिका में बैठकों की व्यवस्था करना, फोन कॉल और ईमेल के जरिए दोनों देशों के अधिकारियों को जोड़ना शामिल था, जो संकट के प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक भूमिका निभा रहा था। भारतीय दूतावास ने उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रूबियो के साथ एक बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल की बैठक कराने में भी मदद मांगी थी, जिससे भारत की व्यापक कूटनीतिक पहुंच की इच्छा स्पष्ट होती है और यह भी पता चलता है कि भारत अमेरिकी राजनीतिक स्पेक्ट्रम के विभिन्न हिस्सों से संपर्क स्थापित करना चाहता था।लॉबिंग फर्मों की कार्यप्रणाली और प्रभाव
वाशिंगटन डी और सी. में लॉबिंग फर्मों का एक जटिल और सुस्थापित तंत्र है। ये फर्म विदेशी सरकारों को अमेरिकी नीति निर्माताओं, सांसदों और प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंच बनाने में मदद करती हैं। उनकी विशेषज्ञता में कूटनीतिक संदेशों को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करना, बैठकों की व्यवस्था करना और महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करने के लिए जानकारी प्रदान करना शामिल है। संकट के समय में, ये फर्म पर्दे के पीछे रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, जिससे तनाव कम करने या किसी देश के हितों को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है। FARA दस्तावेज इन फर्मों की गतिविधियों में पारदर्शिता लाते हैं, जिससे जनता को यह जानने का मौका मिलता है। कि कौन सी विदेशी सरकारें अमेरिकी नीति को प्रभावित करने के लिए किन फर्मों का उपयोग कर रही हैं। यह प्रणाली, हालांकि विवादास्पद हो सकती है, अमेरिकी राजनीतिक परिदृश्य का एक अभिन्न अंग है और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।भारतीय विदेश मंत्रालय का स्पष्टीकरण
इन खुलासों पर भारतीय विदेश मंत्रालय के सूत्रों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संपर्क बढ़ाने के लिए अमेरिका में विभिन्न दूतावास, प्राइवेट कंपनियां और व्यावसायिक संगठन लॉबिंग फर्मों और कंसल्टेंट्स का सहारा लेते हैं। यह एक सामान्य और कानूनी प्रक्रिया है। भारतीय दूतावास भी 1950 के बाद से ही आवश्यकता के अनुसार ऐसी फर्मों के साथ अनुबंध करता रहा है। मंत्रालय ने जोर देकर कहा कि अमेरिका में डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस में फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत विदेशी सरकारों के साथ लॉबिंग करना कानूनी और स्थापित प्रथा है। जस्टिस विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर इसका पूरा रिकॉर्ड है कि कब-कब, किसने-किन लॉबिंग फर्मों के साथ संपर्क किया। इसे किसी प्रकार की मध्यस्थता के तौर पर देखना एकदम गलत है, बल्कि यह एक पारदर्शी कूटनीतिक प्रक्रिया। का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी सरकार के साथ सीधे और प्रभावी ढंग से संवाद स्थापित करना है।कांग्रेस के सवाल और व्यापारिक संबंधों पर संदेह
अमेरिकी लॉबिंग फर्मों की रिपोर्ट्स पर कांग्रेस ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है और कांग्रेस नेता अमिताभ दुबे ने कहा कि 10 मई 2025 को बहुत कुछ हुआ, जिसके बाद ऑपरेशन सिंदूर को रोकने का पहला ऐलान अमेरिका की ओर से किया गया। दुबे ने इस बात पर जोर दिया कि 10 मई को जिन अमेरिकी। अधिकारियों से संपर्क किया गया, उनमें यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर भी शामिल थे। इससे यह शक पैदा होता है कि क्या सैन्य कार्रवाई। रोकने के फैसले में व्यापार से जुड़े पहलू भी थे। कांग्रेस का यह बयान इस पूरे घटनाक्रम में एक नया आयाम जोड़ता है, जो कूटनीतिक और सैन्य निर्णयों के बीच संभावित व्यापारिक प्रभावों पर सवाल उठाता है। यह सवाल उठाता है कि क्या भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की स्थिति ने सैन्य संघर्ष को समाप्त करने के निर्णय में कोई भूमिका निभाई, जिससे भविष्य में ऐसे निर्णयों की पारदर्शिता पर बहस छिड़ सकती है।खुलासे और भविष्य की कूटनीति
FARA दस्तावेजों के ये खुलासे भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले साल के सैन्य टकराव के दौरान की पर्दे के पीछे की कूटनीतिक गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। यह स्पष्ट है कि 'ऑपरेशन सिंदूर' ने पाकिस्तान में गहरी चिंता पैदा की,। जिससे उसे युद्ध रोकने के लिए अमेरिका से गहन हस्तक्षेप की मांग करनी पड़ी। वहीं, भारत ने भी अमेरिकी प्रशासन के साथ अपने संपर्कों को मजबूत करने के लिए लॉबिंग फर्मों का उपयोग किया और इन दस्तावेजों से अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में लॉबिंग फर्मों की महत्वपूर्ण भूमिका और संकट के समय में कूटनीतिक चैनलों के महत्व का पता चलता है। कांग्रेस द्वारा उठाए गए सवाल, विशेष रूप से व्यापारिक पहलुओं को लेकर, इस घटनाक्रम की जटिलता को और बढ़ाते हैं और भविष्य में ऐसी स्थितियों में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर देते हैं। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे भू-राजनीतिक तनाव के दौरान भी कूटनीतिक और आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।