उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 2027 के विधानसभा चुनाव अभी काफी दूर हैं, लेकिन सियासी बिसात पर मोहरे अभी से चलने शुरू हो चुके हैं। रामपुर का ताजा घटनाक्रम महज दो नेताओं के दौरों की कहानी नहीं है, बल्कि यह मुस्लिम वोटों पर दावेदारी, नेतृत्व की लड़ाई और भाजपा विरोधी राजनीति में अपनी-अपनी जगह बनाने और बचाने की एक बड़ी कवायद है। इस पूरी राजनीतिक हलचल की शुरुआत 18 अक्टूबर को हुई, जब ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी रामपुर पहुंचे। रामपुर में ओवैसी ने मुसलमानों की रहनुमाई पर तीखे सवाल उठाए और एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा उछाला।
अपने दौरे के दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने गांधी, नेहरू और यादव जैसे राजनीतिक नामों के बीच मुस्लिम नेतृत्व की गैरमौजूदगी का कड़ा मुद्दा उठाया। उन्होंने समाजवादी पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए जेल में बंद वरिष्ठ नेता आजम खान की उपेक्षा को लेकर करारा तंज कसा। ओवैसी के इस हमले के ठीक चार दिन बाद 22 अक्टूबर को समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद रामपुर पहुंच गए। अखिलेश यादव का पूरा कार्यक्रम पूरी तरह से आजम खान के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा। जौहर यूनिवर्सिटी में हेलीकॉप्टर से उतरने से लेकर जिला जेल में आजम खान और उनके बेटे से मुलाकात करने तक, हर कदम पर राजनीतिक संदेश था। अपनी वापसी के दौरान आजम खान की पत्नी तंजीम फातिमा से मिलना भी इसी सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का एक अहम हिस्सा माना गया।
ओवैसी ने जिस मुस्लिम नेतृत्व के सवाल पर समाजवादी पार्टी को घेरा था, ठीक उसी मुस्लिम मानस को भरोसा दिलाने के लिए अखिलेश यादव ने आजम खान के साथ खड़े होने का संदेश दिया। दरअसल, समाजवादी पार्टी की चुनावी ताकत का एक बड़ा हिस्सा इसी मुस्लिम और यादव समीकरण पर टिका हुआ है। ओवैसी के निशाने पर केवल अखिलेश यादव ही नहीं थे, बल्कि उनका सीधा आरोप कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की उस पारंपरिक राजनीति पर था, जिसमें मुस्लिम वोटर केवल एक वोट बैंक बनकर सिमटकर रह गया है। ओवैसी ने खुलकर कहा कि मुसलमानों में खुद लीडरशिप करने की पूरी कुबूत है, तो फिर वे दूसरों के भरोसे क्यों रहें।
गांधी और नेहरू का उल्लेख करके उन्होंने परोक्ष रूप से कांग्रेस पार्टी पर चोट की थी, वहीं यादव का नाम लेकर सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी की राजनीति को निशाना बनाया और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में यह हमला बहुत अधिक मायने रखता है, क्योंकि सपा का मुस्लिम और यादव समीकरण ही पार्टी की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। ओवैसी इसी समीकरण में से मुसलमानों को पूरी तरह से अलग करना चाहते हैं। उनकी मुख्य दलील यही है कि सेक्युलर पार्टियों को मुसलमानों की याद सिर्फ और सिर्फ चुनाव के वक्त ही आती है। साथ ही, वोटों में इतनी बड़ी हिस्सेदारी होने के बावजूद सेक्युलर पार्टियां अपने उम्मीदवार तय करते समय मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक ताकत की पूरी अनदेखी करती हैं।
रामपुर में आजम खान का प्रसंग ओवैसी की इस राजनीतिक रणनीति के लिए विशेष रूप से बेहद मुफिद साबित हुआ। आजम खान समाजवादी पार्टी के बहुत ही वरिष्ठ नेता हैं और उनका अपना एक अलग राजनीतिक आधार है। मुस्लिम समुदाय के एक बड़े हिस्से में उनकी छवि हमेशा से एक प्रभावशाली और जुझारू नेता की रही है। पिछले लंबे समय से लगातार कानूनी मुकदमों और जेल में रहने के चलते भाजपा विरोधी वोटरों के एक बड़े वर्ग में उनके प्रति सहानुभूति काफी बढ़ गई है। ओवैसी ने बिल्कुल सही नब्ज पर हाथ रखा और जनता से सवाल किया कि जिस नेता ने समाजवादी पार्टी के लिए वर्षों तक मुस्लिम राजनीति का एक मजबूत चेहरा बनकर पूरी निष्ठा से काम किया, संकट के इतने कठिन समय में पार्टी का मुख्य नेतृत्व उसके साथ कितना खड़ा दिखाई दिया?
अखिलेश यादव के रामपुर दौरे के समय और निहितार्थ को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में भारी उत्सुकता बनी हुई है। हालांकि यह भी मुमकिन है कि अखिलेश यादव का यह दौरा पहले से ही तय किया गया हो, लेकिन इस पूरे दौरे के आजम खान के इर्द-गिर्द ही पूरी तरह केंद्रित होने ने उन तमाम संवेदनशील मुद्दों को और अधिक सरगर्म कर दिया, जिन्हें ओवैसी ने अपनी सभा में उठाया था। अखिलेश यादव ने सीधे जौहर यूनिवर्सिटी के हेलीपैड पर अपना कदम रखा और वहां से सीधे जिला जेल पहुंच गए और जेल के अंदर उन्होंने आजम खान और उनके बेटे से लंबी बातचीत की और फिर सीधे आजम खान के आवास पर जाकर उनकी पत्नी तंजीम फातिमा से मुलाकात की।
अखिलेश यादव के इस पूरे कार्यक्रम की हर एक कड़ी का अपना गहरा राजनीतिक अर्थ है। जौहर यूनिवर्सिटी हमेशा से आजम खान की एक बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना रही है। जैसे ही इस यूनिवर्सिटी का नाम सामने आता है, वैसे ही आजम खान का पूरा राजनीतिक सफर और उनसे जुड़े तमाम विवाद स्वतः ही चर्चा में आ जाते हैं। जेल के अंदर जाकर मुलाकात करना सीधे तौर पर यह संदेश देता है कि पार्टी संकट के समय आजम खान के साथ पूरी मजबूती से खड़ी है। उनके परिवार से उनके घर जाकर मिलना इस संदेश को और अधिक पुख्ता करता है। लगभग एक साल के लंबे अंतराल के बाद आजम खान के साथ अखिलेश यादव की यह मुलाकात ठीक उस वक्त सामने आई, जब ओवैसी रामपुर की धरती पर समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को पूरी तरह घेर चुके थे। राजनीतिक विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या अखिलेश का यह दौरा ओवैसी के आक्रामक हमले का सीधा जवाब था।
उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में मुस्लिम वोटों का गणित हमेशा से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। राज्य में मुस्लिम वोटर चुनावी नतीजों पर कितना और कैसा असर डाल सकते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर उनकी तादाद सीधे तौर पर चुनाव के पूरे समीकरण को निर्णायक रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखती है, तो कुछ इलाकों में उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत बनाने के लिए अन्य समुदायों के मतों का सहयोग लेना पड़ता है। उत्तर प्रदेश की कुल 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है, जबकि 70 सीटों पर यह आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और रुहेलखंड का पूरा इलाका इस चुनावी लिहाज से बेहद खास और संवेदनशील माना जाता है।
सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, अमरोहा, मेरठ और बरेली जैसे तमाम जिलों में मुस्लिम वोटरों का एक-एक रुख चुनावी नतीजों पर खासा असर डालता है। किसी भी चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, विभिन्न जातीय समीकरण, किसानों की राजनीति और कानून-व्यवस्था जैसे तमाम समीकरणों की अपनी एक भूमिका जरूर होती है, लेकिन मुस्लिम वोटरों का एकमुश्त झुकाव किसी भी राजनीतिक पार्टी को सीधे और मजबूत मुकाबले में लाकर खड़ा कर देता है। मुस्लिम वोट बैंक पर बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौर से ही समाजवादी पार्टी की बहुत मजबूत पकड़ चली आ रही है। मुलायम सिंह यादव के बाद मौजूदा समय में अखिलेश यादव ने भी इस समीकरण को पूरी तरह संजोए रखा है। इसका एक बहुत बड़ा कारण भारतीय जनता पार्टी से मुस्लिम वोटर की वैचारिक दूरी भी है और मुस्लिम वोटर हमेशा उसी की ओर झुकता है, जो पार्टी भाजपा को सीधे तौर पर हराने का माद्दा रखती हो। फिलहाल उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ी और मजबूत चुनौती के रूप में समाजवादी पार्टी ही खड़ी है।
अब यह सवाल भी बेहद अहम है कि ओवैसी की पार्टी उत्तर प्रदेश की राजनीति में वास्तव में कितनी बड़ी चुनौती बन सकती है। ओवैसी की राजनीति का एक बेहद दिलचस्प और अनोखा पहलू यह देखने को मिलता है कि उनकी जनसभाओं में मुस्लिम समुदाय की बहुत अच्छी-खासी भीड़ हमेशा जुटती है। लेकिन यह विशाल भीड़ अक्सर चुनावी नतीजों के वक्त वोटों में तब्दील नहीं हो पाती है। साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने कुल 95 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे, लेकिन पार्टी को कुल मिलाकर आधा प्रतिशत से भी कम वोट मिले थे। आलम यह रहा कि पार्टी का खाता तक नहीं खुला और एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हो सकी, बल्कि उसके सभी उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी।
हालांकि इसके विपरीत बिहार के राजनीतिक मैदान में एआईएमआईएम को कुछ हद तक सफलता जरूर हासिल हुई थी, लेकिन उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य और सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह से अलग है। यहां समाजवादी पार्टी का मजबूत सांगठनिक ढांचा और भारतीय जनता पार्टी से उसका सीधा और कड़ा मुकाबला मुस्लिम वोटरों को किसी भी तरह के बिखराव से रोकता है और इसके अलावा, असदुद्दीन ओवैसी पर अक्सर भारतीय जनता पार्टी की बी टीम होने का गंभीर आरोप भी लगाया जाता है, जो उनके राजनीतिक विस्तार के रास्ते में एक बड़ा बाधक बनता है। विरोधी राजनीतिक दल लगातार यह दलील देते रहते हैं कि ओवैसी को वोट देने का सीधा मतलब मुस्लिम वोटों का बिखराव है, जिसका अंततः सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को ही मिलता है।
इन तमाम राजनीतिक चुनौतियों और आरोपों से उबरने के लिए ओवैसी लगातार अपनी तरफ से पुरजोर कोशिशें कर रहे हैं। साल 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव में वे क्या कमाल कर पाएंगे या नहीं, यह तो आने वाला भविष्य ही तय करेगा। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि उनकी रैलियों और सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ खासतौर पर समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को पूरी तरह से सजग और सचेत जरूर करती है। समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम वोट बैंक में तनिक सी भी सेंधमारी किसी भी कीमत पर कतई कुबूल नहीं है और इसीलिए रामपुर का यह पूरा सियासी घटनाक्रम आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा दे सकता है।